इस बार बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की जयंती पर देश में ज्यादा गहमागहमी रही। यह स्वाभाविक भी है। यह उनका 127 जयंती वर्ष है। फिर, आंबेडकर की स्वीकार्यता या उनके प्रति श्रद्धा-भाव दिनोंदिन और व्यापक होता गया है। इस बार संयुक्त राष्ट्र ने भी उनकी जयंती पर उन्हें याद किया और समानता के अधिकार के संघर्ष में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए उनके वैश्विक महत्त्व को स्वीकार किया। लेकिन देश में आंबेडकर के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने की होड़ में कहीं न कहीं सियासी गरज भी शामिल दिखती है।
आंबेडकर दलितों में परम श्रद्धेय तो ही हैं, उनके लिए प्रेरणा के भी स्रोत हैं। दलितों की नई पीढ़ी आंबेडकर के चिंतन को ही अपनी विचारधारा मानती है। फिर, दलितों में आई राजनीतिक जागरूकता लगातार बढ़ी है, वे अपनी अस्मिता और हितों को लेकर पहले से अधिक सचेत नजर आते हैं। उनकी इस जागरूकता और उनकी विशाल संख्या के मेल ने उन्हें एक बहुत महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति में बदल दिया है, जिसकी अनदेखी कोई भी पार्टी नहीं कर सकती।
यही कारण है कि आज राजनीतिक दलों में आंबेडकर के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने और उन्हें भुनाने की होड़ दिखती है। कई पार्टियों ने आंबेडकर को याद करते हुए रैली तो आयोजित की ही, अपने को सच्चा आंबेडकर-भक्त बताने और आंबेडकर के प्रति दूसरों की भक्ति को दिखावा करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके पीछे राजनीति में एक दूसरे पर बढ़त बनाने के लिए हमेशा चलती रहने वाली कोशिशों के अलावा एक वजह यह भी रही होगी कि इस वक्त कुछ राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, तथा अगले साल उत्तर प्रदेश व पंजाब समेत कुछ राज्यों में होने हैं। लिहाजा, आंबेडकर के बहाने एक दूसरे पर हमला बोलने में कोई किसी से पीछे नहीं रहा।
अगर इसके लिए उन्होंने खुद को सचमुच तैयार किया होता तो आज राजनीति में धनबल और बाहुबल का ऐसा बोलबाला नजर न आता। संवैधानिक मूल्यों का ऐसा क्षरण न हो रहा होता। हालत यह है किसंवैधानिक मूल्यों को चोट पहुंचाने में कई ऐसे लोग भी शामिल रहते हैं जो खुद संविधान की रक्षा की शपथ लिये हुए हैं। आंबेडकर के प्रति श्रद्धा प्रदर्शन की इस होड़ में असल मुद््दे नदारद रहे। मसलन, अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण कानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों में सजा की दर काफी कम क्यों है? अनुसूचित जाति आयोग को पर्याप्त अधिकार क्यों नहीं दिए गए हैं; वह सिर्फ एक सिफारिशी निकाय बन कर क्यों रह गया है? आंबेडकर के संदेश को छोड़ कर आंबेडकर को अपनाना सिर्फ एक राजनीतिक खेल भर होगा।
