आज की पत्रकारिता का जो बिगड़ता स्वरूप सामने आता जा रहा है वह आने वाले समय के लिए कितना शुभदायी है इस पर विचार अवश्य करें …. !
पत्रकारिता का चीरहरण करके उसका जिस तरह बाजारीकरण हुआ उससे समाज के सूचना और अभिव्यक्ति की की जो दुर्दशा हुई उस सदमे से पत्रकार उभर भी नही पाए थे कि पत्रकारिता का पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिकरण भी हो गया अब तो लोग दिलेरी से पूछने लगे है कि आप किस पार्टी के पत्रकार हो ।।।
हम कभी जनता के पक्षकार हुआ करते थे अब नेताओ के पक्षकार बन गए । हमारे बारे में हमारे प्रति लोगो का सोचने का नज़रिया बदल गया कुछ तो दलाल भड़वा वेश्या जैसे अपशब्दों से अपमानित भी करने लगे है मेने अपनी पूरी ज़िंदगी में पत्रकारो को इसतरह कभी बेइज़्ज़त होते नही देखा जो यह पत्रकारों को शर्म से डूब मरने की बात है। क्योंकि जो पत्रकार वास्तव में लोकतंत्र की मर्यादा और गरिमा को समझते है वे आज पत्रकारिता की इस दुर्दशा से दुखी हैं ।
पत्रकारिता लोकतंत्र की बुनियाद को जिस तरह खोखला कर रही है वह आने वाले समय में लोकशाही के लिए खतरा पैदा कर सकती है । पत्रकारिता हमेशा से एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका में होती रही है। और उसका वही स्थान है । लेकिन पूंजीवादियों ने सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर बैठे खद्दरधारीयो से मिलकर इसे बाजारीकरण से लेकर इसे राजनीतिकरण तक पहुचा दिया। जो पत्रकारिता कभी मिशन हुआ करती थी अब कुछ स्वार्थी लोगो की चाटुकारिता से उनकी रोजी रोटी का साधन बन चुकी है ।……
पत्रकारों होश में आओ पक्षकारो को अपने बीच से हटाओ ।
,✍ मोहम्मद जमील खान की क़लम से
