विशेष टिप्पणी -अब लोकतंत्र पूर्णतः पूंजीवादियों के हाथों में जाता दिख रहा है । दिनोदिन मंहगे होते जा रहे चुनाव आम आदमी जो शिक्षित योग्य समाजसेवा से जुड़ा है उसके लिए चुनाव लड़ना दूर का सपना हो गया है क्योंकी राजनीति में पूंजीपतियों बाहुबलियों अपराधियो का बोलबाला पूरी तरह हो गया है जो किसी भी तरह देशहित में न्याय संगत नही है । क्या कभी सोचा गया है कि हजारों कुर्बानिया देकर अंग्रेजो से देश को आज़ाद करने वालो की कुर्बानिया योंही बेकार चली जायेगी । सवाल विचारणीय है कि हम अपनी अगली पीढी को क्या ऐसी सड़ी गली व्यवस्था देकर जाएंगे । अब समय बदल गया और इस बदलते समय ने लोकतंत्र के राजनैतिक मायने ही बदल डालने में कोई कोरकसर नही छोड़ी जा रही है।
बड़े राजनैतिक दलों की इस साजिश और सियासत को बेनकाब करने के लिए नेताओ की भारीभरकम सैलरी भत्ते सुविधाएं तथा सुरक्षा पर होने वाला अनावश्यक व्यय बंद होना चाहिए। क्या जनप्रतिनिधि अधिनयम में ऐसा कोई प्रावधान के कि नेताओ को शाही ठाठ बाट सुरक्षा और सुविधाएं दी जाए अगर इसी खर्च को जन कल्याण में लगाया जाए तो बहुत सी समस्याएं दूर हो सकती है।
लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत जरूरी है पूँजीतन्त्र को उखाड़ फेका जाए जनप्रतिनिधियों के लिए नए मापदण्ड निर्धारित किये जायें ताकि शिक्षित योग्य और समाज सेवा से जुड़े जनसाधारण व्यक्तियों को लोकप्रतिनिधित्व करने के अवसर प्राप्त हों ।इसलिए बहुत जरूरी है
एक देशव्यापी आंदोलन किया जाए और सही मायने में जनगण तक लोकतंत्र स्थापित हो ।जहां जनसाधारण व्यक्ति महत्वपूर्ण हो।
मोहम्मद जमील खान , पत्रकार कटनी मप्र
