भोपाल । सूचना अधिकार अधिनियम 2005 को लागू हुऐ 14 वर्ष हो रहें हैँ । जब यह कानून अस्तित्व मेँ आया तब प्रदेश मेँ भाजपा की सरकार थी तब से लेकर 2018के अंत तक शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इस क़ानून का जमकर दोहन किया । यहाँ तक कि सरकार के समस्त विभागों को निर्देश थे कि सूचना अधिकार क़ानून का जितना हो सके दोहन करो । प्रदेश मेँ हो रहें भ्रष्टाचार को उजागर होने से जिस हद तक हो रोका । शासन प्रशासन की अनियमितताओं को जनमानस के सामनें आने से रोको । नतीजा यह निकला कि आरटीआई कार्यकर्ताओ को दबाया गया , प्रताड़ित किया गया , परेशान किया गया , उनके द्वारा चाही गई जानकारी से उनको ना सिर्फ वंचित किया गया वरन आर्थिक , मानसिक और शारीरिक पीड़ा तक पहुचाई गई । जिसमें सूचना आयोग तक की भूमिका संदिग्ध और असंतोषजनक रही । भाजपा सरकार ने गाहे बगाहे सूचना अधिकार क़ानून को अपनी सुविधाओं अनुसार संशोधित तक किया । 2018 के अंत तक शिवराजसिंह और उनकी सरकार का बोरिया बिस्तर सिमट गया । प्रदेश मेँ कमलनाथ की कॉंग्रेस सरकार आई । जनमानस को यह आशा जगी कि अब परिवर्तन होगा । मगर सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनाव की आचार संहिता , चुनाव और फ़िर परिणाम के बाद बनते बिगड़ते समीकरण के बीच कमलनाथ सरकार का ध्यान उस और जा ही नही पाया जहाँ शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार ने अपनी नाकामियों को छिपाये रखा था । मंत्रालय मेँ जमे अधिकारी कर्मचारी अभी भी वहीं हैँ जिन्होने शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के भ्रष्टाचार , अनियमतताओ को छिपाए रखा था , वह आज भी नही बदले हैँ । इसका ताज़ा उदाहरण आज सामनें आया जब आरटीआई एक्टिविस्ट कौंसिल के राष्ट्रीय महासचिव खेमराज चौरसिया द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग (सूचना अधिकार प्रकोष्ठ ) द्वारा चाही गई जानकारी को देने के स्थान पर विभाग द्वारा कपटपूर्वक शुल्क भी प्राप्त कर लिया और जानकारी भी प्रदान नही की और एक पुस्तिका (जो कि निःशुल्क मिलती है )का शुल्क लेकर अपनी बेईमानी छिपा ली या यह कहें कि शिवराज सिंह चौहान के भ्रष्टाचार को छिपाने का षड्यंत्र किया ।
क्या है मामला –
आरटीआई कार्यकर्ता खेमराज चौरसिया (महाराजपुर , छतरपुर )ने सामान्य प्रशासन विभाग (सूचना अधिकार प्रकोष्ठ )मप्र मंत्रालय भोपाल मेँ अधिनियम की धारा6(1)के अंर्तगत दिनाँक 13-06-2019को आवेदन प्रस्तुत कर निम्न जानकारी चाही थी –
1-2005से 2019 तक राज्य सरकार के किन किन विभागों द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम मेँ कितने संशोधन किये ।
2-राज्य सरकार द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम मेँ किये गए संशोधनों के आदेशों की प्रमाणित प्रतियाँ प्रदान की जाएं ।
श्री चौरसिया के द्वारा प्राप्त आवेदन के सम्बन्ध मेँ मप्र शासन सामान्य प्रशासन विभाग (सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ ) के पत्र क्रमांक एफ 1-366/लौसुअ /2019/1009,भोपाल , दिनाँक 22/06/2019 के माध्यम से श्री धरणेण्द्र कुमार जैन उप सचिव एवं लोक सूचना अधिकारी मप्र शासन सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा आवेदक को सूचित किया कि उसके द्वारा चाही गई जानकारी 106पृष्ठों की है जिसका शुल्क रूपए 02/-प्रति पृष्ठ के मान से रूपए 212/-मुख्य लेखाधिकारी मंत्रालय भोपाल के कार्यालय मेँ जमा करें । आवेदक द्वारा कल शुल्क जमा करने पर आज 28/06/2019को 106 पृष्ठ की जानकारी देने के स्थान पर कपट पूर्वक सूचना का अधिकार अधिनियम 2005मार्गदर्शिका (जो कि निःशुल्क मिलती है )सौंपकर इतिश्री कर ली ।
ताज्जुब इस बात का है कि मंत्रालय के उप सचिव द्वारा झूठा पत्र देकर आवेदक को यह बताया कि उसके द्वारा चाही गई जानकारी 106पृष्ठ की है तथा विधिवत शुल्क लेकर सूचना का अधिकार अधिनियम 2005के नाम पर ना सिर्फ आवेदक के साथ लूट की , वरन सूचना कार्यकर्ताओ के साथ विश्वासघात किया है ।
@सैयद ख़ालिद कैस की विशेष रिपोर्ट
