श्रमण जैन परम्परा में रक्षाबंधन पर्व और उसका महत्व
– डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर 9826091247
रक्षा शब्द सुनते ही कई बातें सामने आने लगती हैं। राष्ट्र और धर्म की रक्षा, जीवों की रक्षा, समाज और परिवार की रक्षा, भाषा और संस्कृति की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा आदि आदि। रक्षाबंधन पर्व भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। आम तौर पर भाई द्वारा बहन की रक्षा और इसके लिए बहन द्वारा भाई को रक्षा-सूत्र या राखी बाँधने का रिवाज ही रक्षा बंधन पर्व माना जाता है। किन्तु यह बहुत कम लोग जानते हैं कि भाई-बहन के आलावा भी प्राचीन भारतीय संस्कृति में यह कई कारणों से मनाया जाता है। इस पर्व से सम्बन्धित अनेक कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। रक्षाबंधन पर्व ही नहीं त्योहार भी है। इसका जैन श्रमण संस्कृति में विशेष महत्व है।
जैन संस्कृति में यह अत्यन्त आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यहाँ यह त्योहार मात्र सामाजिक ही नहीं वरन् आध्यात्मिक भी है। इस त्योहार का संबंध सिर्फ गृहस्थों से ही नहीं, मुनियों से भी है। जिस तरह हिन्दू धर्म में रक्षा बंधन के त्योहार को मनाने को लेकर पुराणों में भिन्न-भिन्न कथाएं मिलतीं हैं उसी तरह जैन धर्म में भी रक्षाबंधन को मनाने के पीछे एक विशिष्ट मान्यता है। यहां के प्रथमानुयोग के ग्रन्थों के अनुसार रक्षाबंधन की कथा कुछ अलग है। यह कथा एक श्रमण मुनि द्वारा 700 मुनियों की रक्षा करने पर आधारित है। यही कथा रक्षाबंधन के त्योहार का आधार है।
इस कथा के अनुसार हस्तिनापुर के राजा महापद्म ने अपने बड़े पुत्र पद्मराज को राजभार सौंप वैराग्य धारण किया। उनके साथ उनका छोटा पुत्र विष्णुकुमार भी अपने पिता के साथ अविनाशी मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर चल दिए। उधर उज्जयिनी नगरी के राजा श्रीवर्मा के मंत्री बलि, नमुचि, बृहस्पति और प्रह्लाद थे। चारों श्रमणें और उनके धर्म के कट्टर विपक्षी थे।
एक बार उज्जयिनी नगरी में अकंपनाचार्य मुनि अपने 700 शिष्यों के साथ पधारे। यहां के राजा श्रीवर्मा के चारों मंत्री अभिमानी थे, यह बात आचार्य जानते थे इसलिए उन्होंने सभी शिष्यों से मौन रहने की हिदायत दे रखी थी। उसी संघ के एक मुनि श्रुतसागर बाद में आये थे, उनसे मंत्रियों का वाद हो गया। वाद में हारने के कारण वे मंत्री कुपित हो गये, मंत्रियों ने मुनि पर उपसर्ग किया किन्तु रक्षक देवों के कारण वे कीलित हो गये। यह वृत्त जानकर राजा ने उस चारों मंत्रियों को राज्य निकाला दे दिया।
वे चारों किसी तरह हस्तिनापुर पहुंचे। उन्होंने वहां के राजा पद्मराय से नौकरी मांगी। राजा ने उन्हें योग्य पदों पर आसीन किया। बलि नामक मंत्री ने पद्मराय का विश्वास हासिल करने के लिए कूटनीति और छल से एक विद्रोही राजा को उसके अधीन करा दिया। अब क्या था पद्मराय ने खुश हो उससे वर मांगने को कहा।
उसने कहा- राजन् वक्त आने पर मांग लूंगा। कुछ समय पश्चात् अकंपनाचार्य मुनि ससंघ हस्तिनापुर पधारे। बलि ने मुनियों से बदला लेने के लिये राजा से अपने वर के रूप में सात दिन के लिए वहां का राजा बनना मांग लिया। इस सात दिन के राजा ने आचार्य सहित 700 मुनियों के संघ पर उपसर्ग करना प्रारंभ किया। जिस स्थल पर मुनि संघ ठहरा था वहां चारों ओर कांटेदार बागड़ बंधवा कर उसे नरमेध यज्ञ का नाम दे वहां जानवरों के रोम, हड्डी, मांस, चमड़ा आदि होम में डालकर यज्ञ किया। इससे मुनियों के गले रुंधने लगे, सांस लेना भी मुश्किल हो गया।
उधर मिथिलापुर नगर के वन में विराजित सागरचंद्र नामक आचार्य ने अवधिज्ञान से मुनियों पर हो रहे इस उपसर्ग को जान अपने शिष्य पुष्पदंत से कहा तुम आकाशगामी हो जाओ और धरणीभूषण पर्वत पर विष्णुकुमार मुनि से इस उपसर्ग को दूर करने की विनय करो वे विक्रिया ऋद्धि प्राप्त कर चुके हैं। क्षुल्लक पुष्पदंत गुरु की आज्ञा पाकर पर्वत पर पहुंचे और मुनियों की रक्षा का अनुरोध किया। विष्णुकुमार मुनि अविलंब हस्तिनापुर आए। यहां उन्होंने 52 अंगुल का शरीर बना तपस्वी का वेश धारण किया और तात्कालिक राजा बलि के पास गए। बलि ने उनका आदर-सत्कार किया और उनसे सेवा का मौका देने को कहा। इस पर तपस्वी वेशधारी मुनि ने उनसे तीन डग जमीन मांगी। मुनि ने अपनी ऋद्धि का प्रयोग करते हुए शरीर बड़ा किया और जमीन नापना शुरू किया। पहले डग में सुमेरू पर्वत और दूसरे को मानुषोत्तर पर्वत पर रखा।
जब तीसरे डग के लिए जमीन नहीं बची तो उन्होंने बलि से कहा अब क्या करूँं तो बलि ने कहा अब मेरे पास जमीन तो नहीं है आप मेरी पीठ पर डग रख लीजिए। मुनि ने तीसरा डग बलि की पीठ पर रखा तो बलि कांपने लगा। देव व असुरों के आसन कंपायमान हो गए। सभी अवधिज्ञान से वृत्तांत जान वहां आए और मुनि से क्षमा की प्रार्थना की। मुनि ने बलि की पीठ से चरण हटाया और असली रूप में प्रकट हुए। उसी समय बलि ने यज्ञ बंद कर मुनियों को उपसर्ग से दूर किया। राजा भी मुनि के दर्शनार्थ वहां पहुंच गए।
नगरवासी सभी श्रावकों ने मुनियों की वैयावृत्ति की उनकी सेवा की और मुनियों को चैतन्य अवस्था में लाए। मुनि पूर्णतः स्वस्थ हो गये, सभी ने खुशियां मनाई।
यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। इसी दिन मुनियों की रक्षा हुई थी। इस दिन को याद रखने के लिए लोगों ने हाथ में सूत के डोरे बांधे। तभी से यह रक्षा बंधन के पर्व के रूप में मानाया जाने लगा। आज यह रक्षाबंधन पर्व/त्येाहार समस्त मानव समाज में एक भाई चारे और स्नेह का प्रतीक है।

