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महाराष्ट्र

जीवन का एक ऐसा चरण जब यशवर्धन लक्ष्य नहीं रह जाता!

जीवन का एक ऐसा चरण जब यशवर्धन लक्ष्य नहीं रह जाता!

 

जैसे-जैसे इंसान की सोंच में परिपक्वता आती है, उसे बड़ी से बड़ी उपलब्धि भी मामूली सी लगने लगती है। छोटे लक्ष्य से सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए वह उस ऊँचाई पर उड़ान भरने लगता है, जिसे उड्डयन की भाषा में cruise phase कहते हैं, उस ऊँचाई में वह बिना किसी आकुलता व ऊहापोह के अपनी लक्ष्य प्राप्ति के आनंद व कृतज्ञता में लीन रहता है। फिर वह कुछ हट के करना चाहता है, क्योंकि वह भरपूर राजस भोग चुका होता है। जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, नाम, शोहरत किसी चीज़ की कमी नहीं रह जाती, तब कई बार एक स्थिरता सी आ जाती है। अंतरआत्मा से सत्व को धारण करने का आदेश आने लगता है, और एक भावसंयमी साधक इस इशारे गंभीरता से लेते हुए, व्यक्तित्व उन्नयन की ओर अग्रसर होने लगता है। ऐसे साधक जीवन यात्रा में फिर से शून्य को अनुभूत करना चाहते हैं जिसे परमानन्द की प्राप्ति कही जाती है। जीवन का एक ऐसा चरण, जब यशवर्धन उनका लक्ष्य नहीं रह जाता, इसलिये वे अपनी पद-प्रतिष्ठा, उपलब्धियों को अपने ह्रदय सागर में विलीन कर देते हैं। दूसरों के रजस में उन्हें थोड़ी भी ईर्ष्या नहीं होती। उनके अंदर दूसरों से प्रतियोगिता नाम मात्र भी नहीं रह जाती। और वे शून्यता में ऐसे डूबे होते है, जैसे पाँचों ऊंगलियाँ घी में हो। इस दरमियान अपने पसंदीदा कार्यों में व कार्यक्षेत्रों में उसे भरपूर तज़ुर्बा भी हासिल हो चुका होता है इसलिए अब उसे दूसरों को प्रोत्साहित करना, निस्वार्थ भाव से दूसरों का मनोबल बढ़ाना, अपनी छोटी बड़ी भावभंगिमाओं से दूसरों के चेहरों पर मुस्कान भरना इत्यादि उसके प्रतिदिन की दिनचर्या बन जाती है। अपने उद्देश्यों के प्रति गम्भीर वह सूत्रधार के रूप में औरों को भी अपनी तरह आगे लाने का प्रयास करता है। कई बार एक विशेष ध्येय को लेकर बड़ा संगठन निर्मित कर या कई बार छोटे स्तर पर लेकिन कदाचित वो हाथ पे हाथ नहीं बैठता. विचार प्रवाह पढ़ते वक्त ध्यान रहे ये गम्भीर ईमानदारी से लबरेज़ भाववसंयमी विरादरी की बात हो की बात हो रही है उपलब्धियों की मीनार खड़ी करने वाले प्रलोभनों के पीछे भागने वाले सूत्रधारों की नहीं। 

 

अब इस नयी भूमिका में एक बहुत कड़वी व निराशाजनक वास्तविकता यह है कि जो लोग समाज के कल्याण के लिए अपना समय और ऊर्जा समर्पित करते हैं, उन्हें हमेशा वाहवाही की तुलना में आलोचना या एहसानफरामोशी अधिक मिलती है। आस्तीन के सांप भी होते हैं कई लेकिन साधक तो ईश्वरीय तत्व के कारण कृतज्ञता की कवच पहने है उसे तो सामने वाले का स्तर पता चल जाता है लेकिन कुटिल भावनाएँ उसके अंदर को प्रभावित नहीं कर पाते। जो लोग नेक इंसानों की आलोचना करने में लिप्त हैं, वे झूठे अहंकार से ग्रसित, अपने भीतर की गरीबी को उजागर करते हैं और इस रहस्य को नहीं समझ पाते कि अच्छा काम करने वाला इंसान, स्वयं को छिद्रान्वेषण प्रतिरोधक बनाकर ही ऐसे कार्यों का बीड़ा उठाता हैं। ऊपर वाले की असीम कृपा और कुछ निष्कपट, निर्मल ह्रदय चीयरलीडर्स ही उन्हें अंदर से समृद्ध बनाये रखते हैं। उनके व्यक्तित्व की आभा, बुद्धिमत्ता, सहनशीलता और गुरूता के साथ प्रदीप्तमान रहता है तथा लोगों में अक्सर प्रेरणा और सदभावना पैदा करने की क्षमता रखता है।

 

- शशि दीप ©

विचारक/ द्विभाषी लेखिका मुंबई

shashidip2001@gmail.com

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