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काश! हम तब गुणगान करते....

काश! हम तब गुणगान करते....

अक्सर देखने सुनने में आता है कि साधारण लोगों को तो भूल जाइये दुनिया में बड़े से बड़े महापुरुषों, नामी हस्तियों को भी जीवन के अंतिम दिनों में पैसा सुख-सुविधा होने के बावजूद बद से बदत्तर हालत में दिन गुजारने पड़े। अनगिनत महान हस्तियां, कलाकार, दर्शकों और हर क्षेत्र के लोगों की बहुत लम्बी सूची बन सकती है। यह सोचकर दिल वाकई दहल जाता है कि  आखिर ये कैसी विचित्र दुनिया है। यहाँ तो सचमुच अच्छे अच्छों की कोई पूछ नहीं तो फिर हम जैसे लोग तो किस खेत की मूली हैं। और हम हैं की छोटी-छोटी उपलब्धियों में अहंकार की परत चढ़ाना शुरू कर देते हैं। 

इंसान जब दुनिया के लिए इतना करने के बाद जर्जर हालत में एकाकी जीवन काटता है तो उसकी आत्मा क्या सोंचती होगी, मैंने एकल संवाद के रूप में गहन विचार किया तो कुछ भाव उद्धृत हुए...इन्सान के अन्दर उस कमजोर हालत में शायद कुछ ऐसे भाव आते होंगे..
कई अच्छे काम किये मैंने जीवन भर लेकिन तूने सिर्फ मेरी गलतियों को उजागर किया। एक समय था, जब मैं चमकता सितारा था, मेरी तस्वीरें अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर छपा करता था। सुबह की चाय के साथ लोग देखते थे, आज यहाँ दौरा किये, भव्य समारोह में कितनी सुन्दर कविता पढ़े, क्या रूआब है, क्या व्यक्तित्व है, क्या आवाज है, क्या अंदाज़ है। लोग हाथ मिलाते थे, आगे पीछे दौड़ते थे, आटोग्राफ लेते थे। जीवन बगिया में बहार ही बहार था और मिलने-जुलने वालों का क़तार ही कतार था। पर आज जब जीवन संध्या आयी तब इन धुंधले अंतिम दिनों में विरले ही लोग पूछते हैं। कभी लगता था, काश मेरे बोझील पावों को कोई सहलाये, दिलचस्प  बातों से मुरझाई आत्मा में कोई सजीवता लाये। मेरे दर्द के समय चिकित्सकों साथ-साथ मेरी ही लिखी कही बातें, कविताएँ कोई दो मिनट प्यार से मुझे सुनाये। पर सब भूल चुके थे और अपनी-अपनी ज़िन्दगी में सब मशगूल हो चुके थे। कौन भारत रत्न, कौन पद्म विभूषण, कौन अनमोल रत्न, कौन महान राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कौन अभिनेता, कौन महान हस्ती। शायद इसीलिये सच ही कहा किसी ने उगते सूरज को ही लोग सलाम करते हैं।जैसे ही रौशनी धूमिल हुई नामोनिशान मिटने लगता है।और जब सचमुच वह चला जाये तो जन सैलाब उमड़ पड़ता है। अर्थी  पर फूल ही  फूल, हार ही हार और चारों तरफ शोक ही शोक। काश इतना ही प्यार तब बरसाते जब वो झुंझहलाये से रहते होंगे। काश! इतना ही गीत, कविता, बातें उनकी तब पढ़ते, सुनाते जब वो उदास से रहते होंगे पर नहीं! दुनिया के लोग जैसे न बदलने की कसम खा रखें हैं। जीवन भर निष्ठुर बने रहना है, अहंकार पालकर कर रखना है और जब कोई चला जाये तब चले आये अर्थी पर फूल चढ़ाने।अब क्या लाभ, वे तो  बैठ गए मृत्यु विमान पर, अब चाहे मेवा मिष्ठान खिलाएं वे तो निकल गए अंतिम यात्रा पर अब चाहे कितना भी आवाज़ लगाएं। वो तो हो गए विलीन पांच तत्व  में अब चाहे कितना भी रोयें, चिल्लाएं या बुलाएं। वो तो पहुँच गए परमात्मा के पास, अब चाहे कितना भी अफ़सोस जताये कितना भी आंसू बहायें, चाहे कितना भी शोक मनाये। काश! तब गुणगान करते जब वो ज़िंदा थे। काश तब उनका मन बहलाते जब वो ज़िंदा थे। कब सीख पायेंगे हम ये हुनर, क्या कभी इस बात को गम्भीरता से लेने की ओर ध्यान दे पायेगा इन्सान?
- शशि दीप ©
विचारक/ द्विभाषी लेखिका
मुंबई
shashidip2001@gmail.com

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