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दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणालियों को संतुलित करना मुश्किल काम

दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणालियों को संतुलित करना मुश्किल काम

01 जुलाई से लागू तीन कानूनों पर टिप्पणी

 

डॉक्टर सैयद खालिद क़ैस

एडवोकेट भोपाल

 

शहरों, रेलवे स्टेशनों, मार्गों के नाम बदलने वाली केंद्र सरकार ने देश में लागू तीन अहम कानून बदल दिये जो 01 जुलाई से सारे देश में अस्तित्व में भी आ गए। भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से बनाए गए तीन नए आपराधिक कानूनों- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के क्रियान्वयन में आने वाली दिक्कतों को नज़र अंदाज़ करके केंद्र सरकार ने कई चुनौतियों को आमंत्रण दिया है, जैसे कि पूर्व से लागू कानूनों के तहत लंबित मामलों की संख्या, नए कानूनों को पूर्वव्यापी रूप से कैसे लागू किया जा सकता है और नए कानूनों के आने से निपटने के लिए बोझ से दबी न्यायपालिका को सुसज्जित करने के लिए बुनियादी ढांचे की कमी।

केंद्र सरकार ने आज़ादी के पूर्व से बनी कानून व्यवस्था में जो परिवर्तन किया उसके दूरगामी परिणाम न्यायपालिका पर बढ़े बोझ को और बढ़ायेगा।

नये कानूनों के अस्तित्व में आने से पूर्व से लागू कानूनों से संपादित मामलों की बढ़ती हुई लंबितता और दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणालियों को संतुलित करना मुश्किल काम साबित होगा। इन तीनों नए कानूनों के लागू होने के बाद कई सारे नियम-कायदे बदल जाएंगे। इनमें कई नई दफा यानी धाराएं शामिल की गई हैं तो कुछ धाराओ में बदलाव हुआ है, कुछ हटाई गई हैं। नए कानून लागू होने पर आम आदमी, पुलिस, वकील और अदालतों के कामकाज में काफी बदलाव होगा। 

गौर तलब हो कि वर्तमान समय में सुप्रीम कोर्ट में कुल 83,068 मामले लंबित हैं, जिनमें से 17,804 आपराधिक मामले हैं और 65,264 दीवानी मामले हैं। इसी प्रकार देश भर की उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ ज़िला न्यायालयों में लाखों मामले लंबित हैं उनका निराकरण पूर्व कानूनों के आधार पर होगा। न्यायालयों में उनका विचारण पूर्व पद्धति से होगा ऐसे में न्यायालयों के समक्ष दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणाली स्थापित होंगी। चूंकि पूर्व स्थापित आपराधिक कानूनों को भारतीय न्यायालयों द्वारा एक सदी से अधिक समय से लागू किया जा रहा है, ऐसे में नए आपराधिक कानून प्रभावी होंगे तो पूर्व कानून अगले 20 वर्षों या उससे अधिक समय तक लागू रहेंगे, जब तक कि लंबित मामले अपनी अंतिम संतृप्ति तक नहीं पहुंच जाते। जब तक कि उनके तहत दायर मामले मजिस्ट्रेट कोर्ट से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट में समाप्त नहीं हो जाते। इस प्रकार, नए कानूनों के आने से भारतीय न्यायालय को लंबित मामलों के साथ-साथ नए मामलों से निपटने का काम सौंपा जा रहा है, जिन पर नए प्रावधान लागू होंगे, जिससे अगले दो से तीन दशकों के लिए "दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणाली" बन जाएगी। इस प्रकार न्यायपालिका के मौजूदा कार्य दबाव पर नए आपराधिक कानूनों को लागू करने के प्रभाव कष्ट दायक होंगे।

यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि किसी भी नए लागू किए गए महत्वपूर्ण आपराधिक कानून को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है, वही प्रक्रियात्मक कानून के लिए सीधा नियम नहीं है और प्रत्येक मामले में तथ्यों के अधीन है। नए कानूनों के आने के साथ हर मामले में ऐसी दुविधा होगी। प्रत्येक लंबित मामले में यह सवाल उठेगा कि किसी विशेष मामले में कौन-सा कानून लागू होगा। यह तीन नए आपराधिक कानूनों के कई प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने के सवाल से बिल्कुल अलग है, जो लोगों के दिमाग में घूम रहा है। 

नये कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 417 में बताया गया है कि किन मामलों में सजा मिलने पर ऊपरी अदालत में उसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। अगर हाईकोर्ट से किसी दोषी को 3 महीने या उससे कम की जेल या 3 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा मिलती है, तो इसे ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

कई धाराएं और प्रावधान बदल गये हैं। आईपीसी में 511 धाराएं थीं, अब 356 बची हैं। 175 धाराएं बदल गयी हैं। आठ नयी जोड़ी गयीं, 22 धाराएं खत्म हो गयी हैं। इसी तरह सीआरपीसी में 533 धाराएं बची हैं। 160 धाराएं बदली गयी हैं, नौ नयी जुड़ी हैं, नौ खत्म हुई हैं। पूछताछ से ट्रायल तक सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से करने का प्रावधान हो गया है, जो पहले नहीं था। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ट्रायल कोर्ट को हर फैसला अधिकतम तीन साल में देना होगा। भारतीय न्याय संहिता में 20 नये अपराध जोड़े गये हैं। ऑर्गेनाइज्ड क्राइम, हिट एंड रन, मॉब लिंचिंग पर सजा का प्रावधान। डॉक्यूमेंट में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं। आईपीसी में मौजूद 19 प्रावधानों को हटा दिया गया है। 33 अपराधों में कारावास की सजा बढ़ा दी गयी है। 83 अपराधों में जुर्माने की सजा बढ़ा दी गयी है। छह अपराधों में सामुदायिक सेवा की सजा का प्रावधान किया गया है।

 

 नए आपराधिक कानूनों को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पूर्व में चुनौती दी गई थी लेकिन उन याचिकाओं को खारिज कर दिया गया, क्योंकि न्यायालय ने पाया था कि कानून अभी तक लागू नहीं हुए हैं। ऐसे में जब 01 जुलाई से भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से बनाए गए तीन नए आपराधिक कानूनों- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम अस्तित्व में आ गए हैं तो संभवत: कानूनों को चुनौती से इंकार नही किया जा सकता है.

तीन नए आपराधिक कानूनों- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का अवलोकन करने पर आप पाएंगे कि केवल नाम, धाराओं के नम्बरों मे अदला बदली के अलावा कोई भारी परिवर्तन नज़र नहीं आता है।

कानूनों का नाम बदला गया है लेकिन उनके अंदर की परिभाषा पूर्व कानूनों की ही सम्मिलित की गई है।धाराओं की संख्या बदलने को कानूनों में परिवर्तन नही कहा जा सकता कुछ धाराओं मे दंड को शिथिल किया गया है वहीं पुलिस को दिये गए व्यापक अधिकार उनको और शक्ति शाली बनाएंगे जो आगे जाकर मानव अधिकारों के हनन की घटनाऐं बढ़ाएंगे. इस प्रकार 01 जुलाई 2024 से अस्तित्व में आये तीन नए आपराधिक कानून- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम न्यायालयों के समक्ष दो समानांतर आपराधिक न्याय प्रणाली का आगाज़ के सिवा कुछ नही हैं।

कॉपी पेस्ट से ज़्यादा कुछ अधिक नहीं तीन नये कानून

जयेश खाड़े महाराष्ट्र इकाई के संयोजक एवं सुरिंदर सिंह दिल्ली इकाई डिजिटल मीडिया विभाग के संयोजक मनोनीत