सैयद ख़ालिद कैस समूह सम्पादक की क़लम से
भोपाल । पिछली सरकार किसान पुत्र कहे जाने वाले शिवराज सिंह चौहान की थी , जिसमें 15वर्ष तक भाजपा किसानों के नाम पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकती रही । किसानों के सीनों पर मंदसौर मेँ गोली चलाने वाली शिवराज सरकार इस विधानसभा चुनाव मेँ भारी जनविरोध के फलस्वरूप सत्ता से बेदख़ल हो गई । चुनाव मेँ कॉंग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की घोषणा के अनुसार कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथग्रहण करते ही किसानों के दो लाख रूपये के ऋण माफ़ी के आदेश कर दिए , जबकि कॉंग्रेस ने सरकार बनने के 10 दिन मेँ किसानों के ऋण माफ़ी का वादा किया था जो पहले ही दिन निभा दिया । अब एक ज्वलनशील सवाल यह है कि किसान कौन ? क्या है किसान की परिभाषा ? किसान किसे माना जाए ? किस क़ानून मेँ किसान को परिभाषित किया गया ? इस सब सवालों पर प्रकाश डालती हमारे मध्यप्रदेश -छत्तीसगढ़ के विशेष प्रतिनिधि खेमराज चौरसिया की खबरें आजतक मेँ प्रकाशित दिनाँक 14/6/2018 की एक ख़बर –https://khabrenaajtak.com/bhartiyekisaankipribhasha/
भारतीय किसान की परिभाषा और निरुत्तर समाज
होर्डिंग पोस्टर बैनर और राजनीति
चुनावी शंखनाद हो चुका है और राजनीतिक पार्टिया जनता को लुभाने के लिए सत्ताधारी पार्टी अपना विकास का गुणगान कर रही है वही विपक्ष भले ही इन बरसों में अप्रत्यक्ष रुप से लाभ लेने के लिए सत्ताधारियों के साथ रहा हो परंतु चुनाव आते ही मुंह जुबानी जंग तेज हो चुकी है जिससे राजनेताओं पर जनता का कितना विश्वास इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की प्रधानमंत्री की सभा हो या मुख्यमंत्री की या विपक्ष के किसी नेता की या कोई और राजनीतिक सभा कार्यकर्ताओं और अधिकारियों पर सभा में भीड़ जुटाने के लिए संसाधन उपलब्ध कराने का मामला हो या अधिकारियों का सरपंच सेक्रेटरी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को उपस्थित होने का फरमान जारी करने की बात हो पर भीड़ तो होनी चाहिए उसके बावजूद भी कार्यक्रम में मंगाई गई कुर्सियां अक्सर खाली ही देखने को मिलती है कोई भी राजनीतिक यात्रा हो भीड़ जुटाने के लिए कार्यकर्ताओं को हर संभव जहां दबाव बनाया जाता हूं वहां संसाधन भी मुहैया कराऐ जाते हैं उसके बावजूद भी सभा में लोगों की उपस्थिति ना होना क्या आज की जनता यह मान चुकी है की राजनीतिक लोग सिर्फ अपने फायदे के लिए ही चुनावी समय अपने मौसम अनुकूल आशियानों से निकलकर जो अपना पसीना इतनी गर्मी में बहाते है उसका फायदा वह स्वयं ही लेंगे आम आदमी की लड़ाई उसको ही लड़ना है चाहे भ्रष्टाचार का मामला या रोजी रोटी का और मजे की बात तो अभी देखने को मिली है राजनेता भी अब इस बात को समझ चुके हैं कि किसी भी मंच के लिए जनता को इकट्ठा करना एक बहुत बड़ी चुनौती है इसीलिए अपने काफिले में ही इतने लोगों को लेकर चलते हैं काफिले से उतरे नहीं की कुर्सियां भर गई और अपने साथ लेकर आए कुछ लोगों से ही अपनी सभा की फोटोग्राफी करा अपना गुणगान करने लगते हैं और इन्ही फोटो को चुनावी माहौल बिना सभा में जाए लोग गुणगान भी करने लगते है कुछ अखबार और टीवी वालों को घर बैठे बना बनाया खाने को मिल जाए तो बनाए कौन और साथ में मिल जाए मिठाई तो बात ही क्या है।
जानकारों का मानना है की जनता का नेताओं से उठता विश्वास एक गंभीर समस्या है इसका कुछ कारण सभी पार्टियों में गुटबाजी एवं निजी स्वार्थ के लिए हम साथ-साथ और संघर्ष करने के लिऐ जनता है इस बात को लोग बखूबी जानने लगे जैसा की राजनीति में मुद्दा कभी खत्म नहीं होता वैसे ही देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति के सम्मान की बात तो सभी करेंगे उसके लिए भी संघर्ष करने का भी दिखावा करेंगे पर बात न्यायालय की आएगी तो राजनेता अपने दोनों हाथ अपने पीछे रख चलते बनेंगे।
संवाददाता:-खेमराज चौरसिया(आरटीआई कार्यकर्ता)
