यकीनन कश्मीर से तथाकथित धारा 370 का हटना दुनिया को चोंकाने वाला और भारत के लिए ऐतिहासिक फैसला है….मीडिया की सुर्खियां बता रही हैं कि सारा देश जश्न में डूबा है…एक भारतीय होने के नाते मुझे भी इस बात की खुशी है…लेकिन सोश्यल मीडिया पर देखने मे आ रहा है कि इस मामले में भावनाओ का अतिरेक हो रहा है…खुशी से ज़्यादा किसीकी हार का जश्न मनाया जा रहा है….पूर्वाग्रह से ग्रस्त कुछ मीडिया समूह और साम्प्रदायिक ‘संघ’ठन और उसकी विचारधारा से जुड़े राजनैतिक दल सारे मामले को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुतिकरण करके इसे एक वर्ग विशेष पर जीत की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं…सम्भवतः इस फैसले को लेने वाली सरकार भी अघोषित रूप से धुर्वीकरण का राजनैतिक फायदा ही उठाना चाहती है जो यकीनन उसे मिलेगा भी….देखा जाए तो ये वक़्त इस फैसले से आहत कश्मीरियों को विश्वास में लेने का है…उनकी बहन बेटियों के बारे में अशोभनीय टिप्पणी करने और कश्मीरियों का भद्दा मज़ाक बनाए जाने की बजाय ये वक़्त उन्हें सहानुभूति पूर्वक ये समझाने बताने का है कि इस फैसले से भविष्य में उनको रोजगार उन्नति विकास सहित क्या क्या लाभ होने वाले हैं…हालांकि केंद्र सरकार का फैसला सही भी है तो इसे लागू करने के तरीके पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं….जिसमें कश्मीर की जनता और वहां के लोकतंत्र समर्थक राजनैतिक दलों को विश्वास में लेने में की गई कोताही भी शामिल है…कुछ लोगों का मानना है कि नोटबन्दी की तरह ये फैसला भी तबड़तोब ले तो लिया गया है लेकिन इस फैसले के नफे नुकसान अभी भविष्य के गर्भ में छुपे हैं…हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी कश्मीरी इस फैसले के खिलाफ होंगे…जो लोग कश्मीर गए हैं और कभी कश्मीरियों से बात की है वो जानते होंगे कि कश्मीरियों के एक बड़े वर्ग को भारत से जुड़े रहने पर कभी कोई एतराज नहीं था…वो केवल अपनी पहचान और मौलिकता कायम रखने के पक्षधर थे…कश्मीर के बाहर से आये लोग उनकी मौलिकता या पहचान को नष्ट न करदें यही डर उन्हें सताता था…राजा हरिसिंह ने सम्भवतः तथाकथित 370 को इसी डर की वजह से जुड़वाया था…राज्य को राष्ट्र में विलय करते समय सरकार द्वारा किये गए वादे को तोड़ना कितना सही या गलत है यह बहस का विषय हो सकता है….बावजूद इसके यह फैसला अभी तो देशहित में प्रतीत हो रहा है जिस पर प्रत्येक भारतीय को इस फैसले के साथ खड़े रहकर खुशी मनाना चाहिए..लेकिन इसी खुशी की मंशा राष्ट्रहित होना चाहिए .. इस फैसले को घोर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से देख कर साम्प्रदायिक दुर्भावना के चलते एक वर्ग को आहत करने वाली टिप्पणियां या नारे लगाए जाने से परहेज़ किया जाना चाहिए…वरना “कश्मीर चाहिए कश्मीरी नहीं” की नीति भारत मे एक नए फिलिस्तीन को जन्म देगी जिसमें सुलगती आग से देश झुलसता रहेगा।
@परवेज़ इक़बाल की क़लम से
