@सैयद ख़ालिद कैस 8770806210
भोपाल । गत दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने समाचार पोर्टल ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा किए गये ट्वीट से रुष्ट होकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ “विवादित” टिप्पणी के आरोप में एफआईआर की ।
देश में व्याप्त महामारी कोरोनावायरस के आतंक के विरुद्ध देश , प्रदेश की सरकारे , हमारे डॉक्टर, पुलिस तथा प्रशासन जिस प्रकार मुस्तैदी से काम कर रही हैं वह किसी से छिपा नही । इस बीमारी के रोकथाम के लिए 21 दिन का लॉक डाउन सम्पूर्ण भारत में लगा हुआ है। इस बीच देशभर में असामाजिक तत्वों द्वारा एक और जन भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है और कुछ असामाजिक तत्व महामारी कोरोनावायरस की आड़ में देशभर में सोशल मीडिया पर झूठी , निराधार खबरें प्रकाशित कर लोगों के बीच अफवाह फैलाकर उनको डरा रहे हैं । आतंक का माहौल निर्मित कर रहे हैं। ऐसे हालात में पुलिस तथा प्रशासन द्वारा मुस्तैदी के साथ असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा रही है ।
संभवत इन कार्यवाहियों में असामाजिक तत्वों के साथ साथ कुछ ऐसे लोग भी कानूनी कार्रवाई में उलझ रहे हैँ, जिनका उद्देश्य देश विरोधी नहीं है। निष्पक्ष रूप से समाज के बीच सच का आईना प्रस्तुत कर रहे हैं, उनके द्वारा व्यक्त किए गए वक्तव्य , खबरें इस प्रकार के हैं जो संभवत कुछ नौकरशाहों, राजनेताओं या जनप्रतिनिधियों को नागवार गुजरते हैं। फलतः ऐसे जनप्रतिनिधि या अफसर खुन्नस निकालने के लिए इस प्रकार की कठोर कार्रवाई उन लोगों के खिलाफ करा रहे हैं , जो मानव अधिकारों का खुल्लमखुल्ला हनन है।
आइए हम आप को समझाते हैं दंड विधान की धारा 505(1) (2)क्या है ? उसके प्रावधान, धारा का कार्यक्षेत्र, ओर धारा में किस प्रकार का दंड का प्रावधान है। तथा इस धारा का पुलिस तथा प्रशासन द्वारा किन परिस्थितियो में उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य धाराएं जिनका उपयोग कोरोना वायरस के विरुध्द जारी अभियान में दिखाई दे रहा है।
भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख)?
भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख), उन मामलों से सम्बंधित है, जहाँ किसी कथन, जनश्रुति या सूचना को, इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, सामान्य जन या जनता के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास कारित हो, जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, रचित, प्रकाशित या परिचालित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति कोई कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट को रचता, प्रकाशित या परिचालित करता है और उसका आशय यह हो या यह सम्भावना हो कि सामान्य जन या जनता के किसी वर्ग के बीच यह भय पैदा होगा या अलार्म का वातावरण पैदा होगा, और जिसके चलते कोई व्यक्ति, राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, तो इस धारा के तहत मामला बनता है। गौरतलब है कि इस कानून के तहत दोषी ठहराए जाने पर व्यक्ति को अधिकतम तीन साल के कारावास और जुर्माने, अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है।
धारा 505 (1) (b)/(ख) के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक सामग्री:- 1 – अभियुक्त द्वारा किसी कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट की रचना, प्रकाशन या परिचालन; एवं 2 – अभियुक्त द्वारा ऐसा इस आशय से किया जाना या ऐसी सम्भावना हो कि सामान्य जन या जनता के किसी भाग के बीच भय पैदा होगा या अलार्म का वातावरण पैदा होगा, और जिसके चलते कोई व्यक्ति, राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो जायेगा; Crl. O.P. No. 22811 of 2019 के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह आयोजित किया था कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) को आकर्षित करने के लिए, अभियुक्त के कृत्य को जनता या जनता के किसी भी वर्ग के लिए खतरे का कारण बनना चाहिए और इसके चलते, राज्य या सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराध करने के लिए जनता या जनता के किसी भी वर्ग को प्रेरित किया जाना चाहिए। शिवमोगा (कर्नाटक) का हालिया मामला – हालाँकि, इस मामले के तथ्यों को हम सत्यापित नहीं कर रहे हैं, पर इस लेख को समझने के लिए हम न्यूज़ रिपोर्ट्स में आये तथ्यों का इस्तेमाल भर कर रहे हैं।]
डेक्कन हेराल्ड की खबर के मुताबिक, शिवमोगा (कर्नाटक) तालुक के नारायणपुरा निवासी नागराज (जोकि एक शिक्षक हैं) के खिलाफ कुमसी पुलिस ने हाल ही में फर्जी खबर फैलाने के चलते, भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस अधीक्षक के. एम. शांताराजू के मुताबिक, अभियुक्त नागराज ने व्हाट्सएप के जरिए कोविड-19 पर फर्जी संदेश फैलाकर लोगों में तनाव पैदा किया। संदेश में यह लिखा था कि कुछ कोविड-19 पॉजिटिव मरीज, शिवमोगा में हैं, और जब तक वे ट्रेस नहीं हो जाते, तब तक लोगों को इलाज के लिए किसी भी अस्पताल में नहीं जाना चाहिए।
न्यू अलीपोर (पश्चिम-बंगाल) का हालिया मामला – हालाँकि, इस मामले के तथ्यों को हम सत्यापित नहीं कर रहे हैं, पर इस लेख को समझने के लिए हम न्यूज़ रिपोर्ट्स में आये तथ्यों का इस्तेमाल भर कर रहे हैं।]
दी इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, इसी प्रकार, न्यू अलीपोर (पश्चिम बंगाल) की एक महिला ने एक व्हाट्सएप ग्रुप पर संदेशों की एक श्रृंखला में यह दावा किया कि उसके पड़ोस में 15 लोग, और उसके घर के पास 2, COVID-19 पॉजिटिव पाए गए थे।
गौरतलब है कि, इस व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्यों के बच्चे, एक स्थानीय प्री-स्कूल में पढने जाते हैं। महिला ने व्हाट्सएप ग्रुप सदस्यों से यह आग्रह किया कि वे किराने का सामान खरीदने के लिए अपने परिवार को बाहर न भेजें। पुलिस ने दावा किया कि महिला के इन संदेशों से व्हाट्सएप ग्रुप सदस्यों के बीच भय एवं अलार्म का वातावरण पैदा हुआ और इसलिए उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत मामला दर्ज किया गया।
हालाँकि, जैसे कि हमने कहा कि हम इन सभी मामलों के तथ्यों को सत्यापित नहीं कर रहे हैं, यहाँ यह साफ़ किया जाना भी आवश्यक है और पाठकों द्वारा यह ध्यान में भी रखा जाना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत दोषसिद्धि के लिए यह दिखाया जाना भी जरुरी है कि अभियुक्त द्वारा किसी कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट की रचना, प्रकाशन या परिचालन के चलते, राज्य या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए जनता या जनता के किसी भी वर्ग को प्रेरित किया गया था।
यहाँ इस बात को नोट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जबतक ऊपर लिखी इस बात को सबित नहीं किया जायेगा, इस धारा के अंतर्गत अभियुक्त की दोषसिद्धि नहीं हो सकती है। अंत में, यह कहना आवश्यक है कि इस लेख का मकसद आप सभी पाठकगण को सजग एवं सतर्क बनाना है, जिससे आप इस महामारी से बचने के लिए अपने आप को न केवल शारीरिक रूप से सुरक्षित रखें, बल्कि आप मानसिक रूप से भी इससे लड़ने के लिए तैयार रहें।
COVID-2019: आपदा संबंधी फर्जी ख़बर फ़ैलाने के क्या हो सकते हैं दुष्परिणाम,
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (31 मार्च, 2020) को अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत संघ Writ Petition(s) (Civil) No(s)468/2020 के मामले में यह कहा कि शहरों में काम कर रहे मज़दूरों का पलायन, देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद इस फ़र्ज़ी खबर के कारण शुरू हुआ कि लॉकडाउन 3 महीने तक चलेगा। इस मामले में पीठ ने आगे यह भी कहा कि, “…हम मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल) से यह उम्मीद करते हैं कि वह जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि दहशत का माहौल पैदा करने वाली खबरें, बिना पुष्टि के लोगों तक नहीं पहुंचे।” दरअसल, इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल पर अपने पक्ष के बारे में हलफ़नामा दायर करते हुए कहा था कि अदालत यह निर्देश दे कि कोई मीडिया, सरकार से तथ्यों की जांच के बिना COVID-19 से सम्बंधित खबरें प्रकाशित नहीं करे। पीठ ने इस बारे में SG की इस दलील पर भी ग़ौर किया कि सोशल मीडिया सहित सभी मीडिया पर भारत सरकार का दैनिक बुलेटिन जारी होगा जो लोगों के संदेहों को दूर करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 54 को भी अपने आदेश में दोहराया, जिसके अंतर्गत एक ऐसे व्यक्ति को सजा देने का प्रावधान किया गया है, जो कोई किसी आपदा या उसकी गंभीरता या उसके परिणाम के सम्बन्ध में आतंकित करने वाली मिथ्या संकट – सूचना या चेतावनी देता है। गौरतलब है कि ऐसे व्यक्ति को दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दण्डित किया जा सकता है।
मौजूदा लेख में हम मुख्य रूप से इसी धारा के बारे में चर्चा करेंगे और इसके साथ ही यह समझने का प्रयास करेंगे कि यदि कोई व्यक्ति एक फर्जी खबर फैलाता है, जिसके परिणामस्वरूप किसी आपदा को लेकर आंतक उत्पन्न होता है, तो ऐसे व्यक्ति को किस प्रकार से दण्डित किया जा सकता है। तो चलिए इस लेख की शुरुआत करते हैं। फर्जी खबर क्यों है खतरनाक? वैसे तो फर्जी खबर को फैलाना एवं इसके फैलने में अपना योगदान देना अपने आप में बिलकुल भी उचित नहीं, परन्तु आपदा के दौरान फर्जी ख़बरों का वितरण बेहद खतरनाक हो सकता है। इसके दुष्परिणाम किसी से भी छुपे नहीं हैं। अलख आलोक श्रीवास्तव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिपण्णी की कि फर्जी ख़बरों के जरिये फैलने वाला आतंक, लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है। पीठ का कहना था कि, “हमें उन लोगों को शांत करने की जरूरत है, जो दहशत की स्थिति में हैं।” हम भी यह जानते हैं कि जनता में खलबली और आतंक पैदा करने वाले विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में गलत सूचनाओं/ फर्जी ख़बरों के प्रसार और कोरोनवायरस से संबंधित फर्जी डेटा साझा करने का चलन आम है। इसके मद्देनजर, बीते 20 मार्च 2020 को इलेक्ट्रौनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ने सोशल नेटवर्क को प्राथमिकता के आधार पर ऐसी किसी भी सामग्री को निष्क्रिय करने और हटाने के लिए तत्काल कार्रवाई करने को कहा था। इसी सम्बन्ध में, सोशल मीडिया मंचों को किसी भी आतंक से बचने के लिए, कोरोनोवायरस से संबंधित प्रामाणिक सामग्री को बढ़ावा देने के सम्बन्ध में एक एडवाइजरी भी जारी की गयी थी। इसी एडवाइजरी के जरिये, सोशल मीडिया मंचों को उपयोगकर्ताओं को गलत सूचना पोस्ट करने से दूर करने के लिए जागरूकता अभियान चलाने के लिए भी कहा गया था।
आखिर क्या है ‘मिथ्या चेतावनी’ (False Warning) और उसके लिए दंड? आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की ‘धारा 54’ के अंतर्गत, ‘मिथ्या चेतावनी’ (False Warning) को दंडनीय बनाया गया है। यह धारा कहती है:- जो कोई जिसे किसी आपदा या उसकी गंभीरता या उसके परिणाम के सम्बन्ध में आतंकित करने वाली मिथ्या संकट – सूचना या चेतावनी देता है, तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दंडनीय होगा उदाहरण इस धारा के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति ऐसा प्रयास करता है कि किसी आपदा या उसकी गंभीरता के सम्बन्ध में आम जनता के बीच आतंक का फैलाव हो तो उसे इस धारा के अंतर्गत दण्डित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति यह कह दे कि किसी महामारी से किसी शहर में हजारों लोग मारे गए हैं (जोकि असत्य है) या किसी महामारी के चलते किसी शहर/प्रदेश या इलाके में राशन खत्म हो गया है (जोकि असत्य है) तो ऐसा व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के मुताबिक, मुंबई में एक व्यक्ति सोहेल ने “मुंबई एकता” नामक व्हाट्सएप ग्रुप पर एक अफवाह पोस्ट की, जिसमें उसने यह कहा कि “मुंबई का नल बाजार, भिंडी बाजार, डोंगरी, मदनपुरा, काला पानी, साट रस्ता इलाका, पुलिस के कण्ट्रोल से बाहर हो चुका है और इसलिए, सेना को बुलाया गया है। वे भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल, लाठीचार्ज के साथ-साथ गोलीबारी का भी इस्तेमाल करेंगे।” इसके पश्च्यात, उक्त व्यक्ति के खिलाफ (कुछ अन्य कानूनों की धाराओं के अलावा) आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 54 के तहत मामला दर्ज किया गया है। साफ़ है, इस धारा का उपयोग इसलिए किया गया होगा क्योंकि यहाँ पर मामला, प्रथम दृष्टया, कोरोना महामारी/आपदा के बीच, आपदा की गंभीरता या उसके परिणाम के सम्बन्ध में आतंकित करने वाली मिथ्या संकट – सूचना या चेतावनी देने वाला प्रतीत हो रहा है।
हालिया वायरल खबर की सच्चाई हाल ही में, एक मैसेज/पोस्ट सोशल मीडिया से लेकर फेसबुक मैसेंजर एवं व्हाट्सअप/टेलीग्राम इत्यादि जैसे मंचों पर भी खूब वायरल हुआ है, जिसमे यह कहा जा रहा है कि कोरोना संबंधित कोई भी जानकारी-अपडेट, सोशल मीडिया में शेयर व पोस्ट करना दंडनीय अपराध है।
इस लेख में हम यह जान ही चुके हैं कि यदि एक व्यक्ति किसी आपदा या उसकी गंभीरता या उसके परिणाम के सम्बन्ध में आतंकित करने वाली मिथ्या संकट – सूचना या चेतावनी देता है, तो ही उसे धारा 54, Disaster Management Act, 2005 (आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005) के तहत दोषी ठहराया जा सकता है। इसलिए इस खबर में कोई सच्चाई नहीं है कि किसी व्यक्ति को कोरोना से सम्बंधित किसी जानकारी को शेयर करने की इजाजत नहीं, या उसे किसी प्राधिकरण से पूर्व इजाजत लेने की आवश्यकता है।
हालाँकि, यह जरुर है कि किसी भी व्यक्ति को फर्जी ख़बरों का वितरण नहीं करना चाहिए, वर्ना उस व्यक्ति पर धारा 54, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत मामला दर्ज हो सकता है (यदि उस मामले में, ऊपर बताये गए, इस धारा से जुड़े सभी अवयव पूरे होते हैं तो)। इसके अलावा, अन्य कोई भी जानकारी को शेयर करने या पोस्ट करने पर कोई भी रोक नहीं है. आपकी सतर्कता ही है आपका बचाव हमारे लिए यह जान लेना भी अत्यंत जरुरी है कि यदि आपके द्वारा कोरोना से सम्बंधित कोई मैसेज प्राप्त किया जा रहा है, तो उस मैसेज को औरों को फॉरवर्ड करने से पहले उसकी सत्यता को जांच लें, क्योंकि हो सकता है कि वह मैसेज असत्य हो और आपके एक मैसेज/जानकारी से औरों को भ्रमित होना पड़े। इसके चलते न केवल, धारा 54, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का मामला आपके खिलाफ बन सकता है, बल्कि कुछ परिस्थितियों में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b) का मामला भी बन सकता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b), उन मामलों से सम्बंधित है, जहाँ किसी कथन, जनश्रुति या सूचना को, इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, सामान्य जन या जनता के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास कारित हो, जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, रचित, प्रकाशित या परिचालित किया जाता है। इस कानून के तहत दोषी ठहराए जाने पर अधिकतम तीन साल के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। अंत में, यह कहना आवश्यक है कि इस लेख का मकसद आप सभी पाठकगण को सजग एवं सतर्क बनाना है, जिससे आप इस महामारी से बचने के लिए अपने आप को न केवल शारीरिक रूप से सुरक्षित रखें, बल्कि आप मानसिक रूप से भी इससे लड़ने के लिए तैयार रहें।
जानिए क्या है सीआरपीसी की धारा 144 और आईपीसी की धारा 188 के मध्य सम्बन्ध?
आईपीसी की धारा 188-क्या हो सकते हैंं प्रशासन के आदेश की अवज्ञा के परिणाम सरकार के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को COVID-19 से संबंधित जानकारी पोस्ट करने की अनुमति नही, वाली खबर झूठी निज़ामुद्दीन में धार्मिक मण्डली में भाग लेकर राज्य में आने वालों की पहचान हो : कर्नाटक हाईकोर्ट COVID-19:सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालयों से बच्चों की अंतरिम ज़मानत पर विचार करने को कहा सैनिटाइज़र और मास्क की उपलब्धता सरकार द्वारा तय की गई कीमत पर सुनिश्चित करने के लिए उठाए कदम, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा अपने ही आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राजस्थान हाईकोर्ट, SC ने एक पीठ के लॉकडाउन के दौरान जमानत मामले सूचीबद्ध ना करने के फैसले पर रोक लगाई । साभारः
