पंकज शुक्ला, 9893699941
एससीएसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद भारत बंद के दौरान देश में हुई हिंसा का सबसे काला अध्याय मप्र से जुड़ा है। यहां ग्वालियर क्षेत्र में आठ लोग मारे गये, डेढ सौ से अधिक लोगों का उपचार हो रहा। हजारों लोगों के नाम एफआई आर है। अब पुलिस का खुफिया तंत्र कह रहा कि यहां हुई हिंसा के लिए मोटी रकम बांटी गई। मप्र के आईजी इंटेलिजेंस मकरंद देउसकर का कहना है कि दंगा भड़काने के लिए पैसा देने वालों में कई अफसर और कई कारोबारी भी शामिल हो सकते हैं! यह खुलासा हमें परेशानी में डालने वाला होना चाहिए। राजनीति तो यह सब करती थी, कारोबारी भी कूट रचते थे लेकिन अफसर? ये भी अब जातियों में बंट कर समाज को तोड़ने के खेल में शामिल हो गए। क्या हमारी सारी आस सरकार से ही होनी चाहिए, सामाजिक संगठनों का कोई दायित्व नहीं? वे सुविधाओं की मांगों और सामूहिक विवाह-परिचय सम्मेलनों तक ही सीमित रहेंगे क्या?
अपने आसपास जरा गौर करेंगे तो पाएंगे कि ऐसे बेरोजगारों युवाओं की फौज है जो राजनीतिक रैलियों में झंडे उठाती है, नारे लगाती है, धार्मिक आयोजन में चंदा उगाही से लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल करती है। यह भीड़ बंद सहित तमाम आंदोलनों में शामिल भी होती और घटनाओं में तमाशबीन बन सेल्फी लेने में जुटी रहती। ये बेरोजगार हैं अपने अपराध भी करते हैं और अवैध कार्यों में भी उलझते हैं। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि इन्हें बरगला कर या पैसे देकर दंगें करवा दिए जाएं।
यूं भी मप्र के लिए यह बात अधिक चिंता की है क्योंकि प्रदेश की गिनती उन राज्यों में होने लगी है, जहां सांप्रदायिक दंगे सबसे ज्यादा हो रहे हैं। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2017 तक मध्यप्रदेश में सांप्रदायिक दंगों के पिछले तीन साल में 205 मामले सामने आए। इन दंगों में 24 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि 535 लोग घायल हुए। 2017 में 56 दंगे हुए तो 2016 में 57 मामले सामने आए थे जबकि वर्ष 2015 में सबसे ज्यादा 92 घटनाएं घटित हुई थीं। मप्र के पहले उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, और राजस्थान ऐसे राज्य हैं, जहां सांप्रदायिक दंगे अधिक हुए हैं।
ये आंकड़ें और हाल की खुफिया रिपोर्ट हमें सचेत करती है कि दलित और सवर्णों या अपनी ही जाति में कई-कई उपवर्गों में बंटे समाज को आगे आना होगा और राजनीति के कुत्सित खेल को विफल करना होगा। क्या जरूरी कि सामाजिक संगठन आरक्षण बचाने या खत्म करने की मांग ही उठाए? क्या जरूरी कि वे केवल त्योहार के मौकों पर भोज और सामूहिक विवाह-परिचय सम्मेलनों के सहारे अपनी राजनीति चमकाएं? वे कुछ ऐसा भी कर सकते हैं कि सरकार पर निर्भरता खत्म हो। ऐसी नजीर हमारे बीच है, हम ही हैं कि इस तरफ से नजरें घुमाए बैठे हैं। जैसे, भोपाल के संत हिरदाराम नगर में सिंधी समाज द्वारा संचालित की जाने वाली गतिविधियां। मानव स्वावलंबन साख सहकारिता संस्था सिंधी बेरोजगार युवाओं को व्यापार के लिए ऋण देती है। बीते 12 सालों में 2000 हजार से अधिक युवाओं ने कर्ज लेकर काम धंधा किया और पैसा लौटाया। संस्थान की वसूली दर सौ फीसदी है।
इसी तरह जीव सेवा समिति बच्चों को पढ़ाई में दस हजार तक की सहायता करता है। यहां जाति का कोई भेद नहीं। किसी जाति का गरीब बच्चा हो उसे सहायता मिलती। संस्था हर वर्ष 200 बच्चों तक की सहायता करती। उच्च शिक्षा सहायता अलग। इसी तरह विधवा महिलाओं तथा गरीब परिवारों को 500 से एक हजार रुपए तक राशन सहायता दी जाती है। खास बात यह कि एक बार सहायता स्वीकृत होने के बाद हर माह पैसा या राशन लेने नहीं जाना पड़ता। राशि बैंक से और राशन तय दुकानों से बिना बाधा मिलता रहता। यानि व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाई जाती। बच्चों को पोषण आहार दिया जाता। गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में नगदी और गृहस्थी की सामग्री प्रदान की जाती। सभी कार्य इस शर्त और मंशा के साथ कि समाज के बंधु हाथ न फैलाएं, धनाभाव में वंचित न रहें और बेरोजगार बन निकम्मे न बनें बल्कि अपने धंधे से दूसरों को रोजगार दे।
दूसरे समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्यों अगड़ी और पिछड़ी जातियों के सम्पन्न लोग आगे आ कर अपनी ही जातियों के कमजोर तबके को ताकत देते।
राजनीति के नक्शे कदम पर चल कर हम खाली हाथों में पत्थर और बंदूकें, झंडे और तख्तियां तो पकड़ा रहे हैं मगर यह अपना भविष्य ही दांव पर लगाने जैसा है। उसी शाख को काटने जैसा जिस पर हम बैठे हैं। समझ सकें तो समझिए, और बांटने की नीति से आगे आ कर कुछ जोड़ना सीखिए।( साभार)
