NITIN DUBEY ✍️ 9630130003
महिला लक्ष्मी है तो पुरुष नारायण। नारायण के बगैर लक्ष्मी का कोई अस्तित्व नहीं। कहते हैं एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। लेकिन किसी तालाब में ऐसी लाखों- करोड़ों मछलियां होंगी तो क्या होगा?
बचपन में मैंने किसी भी महिला को चाची,बुआ,ताई, दीदी,बहन कह कर ही संबोधित किया है,चाहे वो मेरे रिश्ते में हो या न हो,चाहे उनकी कोई भी जाति बिरादरी हो। लेकिन जब मैंने दुनिया देखी तो इन संबोधन के मायने ही नहीं थे। पति के आफिस या बाहर जाते ही वो नारी अपने वायफ्रेड के साथ घूमने चली गई। करवाचौथ का व्रत रखा है और मेहंदी लगवाने अपने लड़के दोस्त के साथ जा रही है।
शहर में शराब,मादक पदार्थ का सेवन और गांवों में ये सब नहीं है लेकिन माहौल शहरों से भी ज्यादा दूषित!
कई महिलाएं मायके भी अपने माता-पिता से मिलने नहीं जा रही हैं बल्कि उस लड़के से मिलने जाती है जिसे शादी होने के कारण छोड़ कर आईं है। ये पति के साथ -साथ माता-पिता से भी धौखा है। महिलाएं घर परिवार के साथ साथ पूरे समाज की धुरी है अगर धुरी ही ग़लत दिशा में होगी तो समाज की चाल तो बिगड़ेगी ही।
आप देखिए जब हम कोई कांच का सामान या हीरा ही मान लिया जाए,खरीदते हैं तो हम उसे कितनी हिफाजत से रखते हैं। लेकिन वो हीरा कहे कि मुझे तो हिफाजत नहीं स्वच्छन्दता चाहिए तो सोचो उसके परिणाम क्या होगा?
आज़ आरक्षण, आजादी और क़ानून और न्याय के आरक्षण ने महिलाओं को निरंकुश बना दिया है।
किस बात की आजादी? किसके अधिकार और कौन सी प्रताड़ना? ये सब बेकार की बातें हैं। पीड़ित वो नहीं है जो सुबह से काम पर निकलता है और पूरे दिन अपने परिवार की चिंता करके धन कमाता है।
मुझे तो लगता है कि हमारे अति लाड़,अति सहानुभूति और अति से ज्यादा विश्वास ने महिलाओं को निरंकुश बना दिया है।
अगर घर में किसी भी रिश्ते में ऐसी महिला हो तो आपके पास तीन ही विकल्प हैं। संन्यास,जेल या उसका त्याग। इन सब में त्याग सर्वोत्तम है।
