@पुष्पा चंदेरिया
भोपाल।दुनिया भर में पत्रकारों की असुरक्षा के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। भारत वर्ष में भी पत्रकारों के साथ बीते 7 वर्षों में हुए व्यवहार पर यदि नजर डाले तो हम पाएंगे कि हमारे देश में भी लोकतंत्र का चौथास्तम्भ कहे जाने वाली पत्रकारिता भय और आतंक के बीच जीवन जी रही है। सरकार या देश विरोधी विचार धारा को आइना दिखाओ तो देश द्रोह,तमाम जांच एजेंसियों के शिकार बनाया जाता है। जनहित की बात करो तो मारा ओर मरवाया जाता है। निष्पक्ष पत्रकारिता अब एक सपना हो गया है।
हमारे देश में पत्रकारों को ख़तरा विभिन्न क़िस्म की ताक़तों से है। इनमें ड्रग माफिया, आतंकी समूह, निरंकुश सरकारें, जातीय शत्रु, उन्मादी और अराजक तत्व इत्यादि शामिल हैं। इन ताकतों से पत्रकारों को निरन्तर भय बना रहता है। वर्षों से पत्रकार संगठन देश में पत्रकारों की स्थिति से सरकारों को अवगत कराते रहे हैं ,परंतु पत्रकार विरोधी सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। पत्रकार सुरक्षा एवम् कल्याण के लिए प्रतिबद्ध संगठन प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने भारत सरकार से देश में पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की जब मांग की तो सरकार से सिरे से नकार दिया ओर गेंद प्रदेश सरकारों के पाले में डाल दी।
वर्तमान परिवेश में हम मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की यदि बात करें तो 2003से मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है।दीदी उमा भारती,बाबूलाल गौर पर फिर शिवराज सिंह चौहान। अपने तीन कार्यकाल में शिवराज सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 2018में कमलनाथ सरकार ने अपने वादे को पूरा करते हुए प्रदेश में पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की पहल ही करी थी कि सरकार गिर गई।पिछले दरवाज़े से बिकाऊ पर गद्दारों की बैसाखियों के सहारे सरकार हथियाने वाली शिवराज सरकार को एक वर्ष से अधिक समय गुज़र चुका है परन्तु अब तक पत्रकार हित में कोई क़दम नजर नहीं आता। कोरोना काल में गैर अधिमान्यता पत्रकार के साथ पक्षपात करने वाली सरकार प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ हो रहे हमलों पर भी ध्यान नहीं दे रही है।
बीते 8माह में संपूर्ण प्रदेश में पत्रकार विरोधी माहौल रहा।राजगढ़ में अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार पर एफ आई आर हो या खरगौन में 6पत्रकारों के खिलाफ झूठा मुकदमा,देवास में झूठी एफ आई आर हो या धार में थाना प्रभारी की प्रताड़ना से तंग पत्रकार द्वारा ज़हर खाने की घटना, ऐसे दर्जनों मामले प्रकाश में आए जिनमें सरकार का सौतेलापन उजागर हुआ ओर पत्रकार शिकार हुआ। सरकार के व्यवहार से जहां अपराधियों, माफियाओ पर पत्रकार विरोधी ताकतों को संरक्षण मिला वहीं पत्रकारिता की अस्मिता को बचाकर रखने वाले पत्रकारों को प्रताड़ना हासिल हुई।
संपूर्ण विश्व में ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स‘ के अनुसार, 1992 से अब तक 1400 से अधिक पत्रकारों की हत्या कर दी गई। उनमें से 890 से अधिक पत्रकारों के किसी भी हत्यारे को कभी न्याय के कटघरे में लाया तक नहीं गया। दोषियों पर कार्रवाई नहीं किया जाना उन्हें ‘दंड से मुक्ति‘ देने के समान है। सौ खून माफ? यानी हत्यारों को ‘इम्प्यूनिटी‘ मिल गई। आज भी दुनिया भर में 274 से अधिक पत्रकार जेल में बंद हैं। यह समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। ताजा आंकड़े पत्रकारों पर हमलों और हत्याओं के नए रिकॉर्ड बना रहे हैं।
मैरी कॉल्विन और डेनियल पर्ल जैसे हाई प्रोफाइल पत्रकार भी हत्या का शिकार हुए हैं। लेकिन मरने वालों में अधिकांश पत्रकार स्थानीय मीडिया से जुड़े हैं। ऐसे आंकड़े असल सच्चाई की एक झलक मात्र हैं। पत्रकारों की पिटाई, अपहरण, कारावास और धमकियों की संख्या काफी अधिक है। उन्हें चुप कराने की कोशिशें भी बड़ी संख्या में हो रही हैं।
साल 2020 में 228 पत्रकारों को भारत में निशाना बनाए गए. इनमें से 114 पत्रकार ऐसे थे जिन्हें नॉन स्टेट एक्टर ने प्रताड़ित किया. नॉन स्टेट एक्टर में मॉब, अज्ञात असामाजिक तत्व, राजनीतिक/संगठनों के समर्थक शामिल हैं. जबकि 112 पत्रकारों और 2 मीडिया हाउस सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रताड़ित किए गए हैं. जिन राज्यों में पत्रकारों को सबसे ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ी है, उनमें पहले पायदान पर है उत्तर प्रदेश (37) और दूसरे पर है महाराष्ट्र (22).
ये दावा राइट एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (RRAG) नाम की एक संस्था के अध्ययन में किया गया है. इस संगठन ने India Press Freedom Report 2020 नाम से पत्रकारों पर सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों, संस्थाओं, व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष और परोक्ष कार्रवाई की एक रिपोर्ट तैयार की है.
साल 2020 में मारे गए 13 पत्रकार
RRAG के इस अध्ययन के अनुसार साल 2020 में 13 पत्रकार मारे गए. इनमें सबसे ज्यादा 6 पत्रकार यूपी में मारे गए. इसके बाद असम और मध्य प्रदेश में 2-2 पत्रकार मारे गए.
RRAG की स्टडी कहती है कि जिन 13 पत्रकारों की मौत हुई थी. उनमें से 12 की हत्या नॉन स्टेट एक्टर्स/अपराधियों द्वारा की गई. जबकि एक पत्रकार की हत्या 2 पुलिसकर्मियों द्वारा नॉन स्टेट एक्टर्स के साथ मिलकर की गई. एक चिंताजनक बात ये रही कि हत्या से पहले इन पत्रकारों ने स्थानीय पुलिस को जान के खतरे की सूचना दी थी लेकिन पुलिस इन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम रही.
101 पत्रकारों पर शारीरिक और ऑनलाइन हमला
RRAG की रिपोर्ट कहती है कि 101 पत्रकार शारीरिक और ऑनलाइन हमले के शिकार हुए. 42 पत्रकारों को पुलिस के साथ दूसरे लोक अधिकारियों ने पीटा. 3 पत्रकारों को कथित रूप से सेना के जवानों ने पीटा. 14 पत्रकारों को कथित तौर पर राजनीतिक दलों के समर्थकों/सदस्यों ने निशाना बनाया.
37 पत्रकार गिरफ्तार किए गए
साल 2020 में 37 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया. RRAG के अनुसार महाराष्ट्र और तमिलनाडु में 5-5 पत्रकार गिरफ्तार किए गए या फिर हिरासत में लिए गए. यूपी और तेलंगाना में ये आंकड़ा 4 का रहा जबकि जम्मू-कश्मीर में 3 पत्रकारों पर गिरफ्तार की कार्रवाई हुई. पश्चिम बंगाल और गुजरात में 2 पत्रकार गिरफ्तार किए गए.
पत्रकारों पर दर्ज की गईं 64 FIR
इस दौरान पत्रकारों पर 64 FIR दर्ज की गईं. ये FIR पत्रकारों द्वारा रिपोर्टिंग करते समय उनके मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए उनके खिलाफ दर्ज की गईं.
कुछ पत्रकारों के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने पर केस दर्ज किए गए जो सिस्टम के भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे. इसके अलावा साम्प्रदायिक दंगों की रिपोर्टिंग करने पर भी कई पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज किया गया. नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रतिक्रिया देने पर भी पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज हुए.।
मध्यप्रदेश की पत्रकार विरोधी नीति
प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स द्वारा लगातार प्रदेश में पत्रकार विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने पर सरकार को आगाह करने का प्रयास किया जाता रहा है। एक माह पूर्ण संगठन द्वारा प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान सहित नवागत राज्यपाल से पत्रकारों की समस्याओं के सम्बन्ध में मुलाकात कर अवगत करने के लिए समय चाहा।दुर्भाग्य का विषय है राजभवन से एक माह बाद 20सितम्बर 2021 को सन्देश मिलता है कि महामहिम नहीं मिलना चाहते ,ज्ञापन उनके एडिसी को दे दो ओर मुख्यमंत्री कार्यालय से कोई संदेश ही नहीं मिलता।यह है प्रदेश की पत्रकार विरोधी सरकार जो पत्रकारों की समस्याओं को हल करना तो दूर सुनना भी नहीं चाहती।
यही नहीं मध्यप्रदेश की पुलिस पत्रकारों के साथ अत्याचार करे ओर उस घटना पर यदि जांच करने का ज्ञापन भी दिया जाए तो पुलिस ज्ञापन देने वालों को भी मानसिक पीड़ा देती है। पिछले 10 माह में प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स द्वारा लगातार प्रदेश में पत्रकार विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने एवम् पत्रकारों के खिलाफ झूठी एफ आई आर होने की जांच के ज्ञापन पुलिस महानिदेशक पर मुख्य सचिव मध्यप्रदेश को भेजे। उन ज्ञापनों पर जांच तो नहीं हुई वरन् विभिन्न जिलों से पुलिस अधिकारियों द्वारा नोटिस भेज कथन के लिए प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नल् के पदाधिकारियों को बुलाया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि पुलिस के खिलाफ यदि कोई कुछ भी बोल दे उसकी शामत ओर यदि पुलिस प्रताड़ना के खिलाफ जांच की मांग करो तो भुगतो। ताज़ा मामले में राजधानी भोपाल में जुलाई रात्रि को एक पुलिस अधिकारी द्वारा अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार के साथ प्रताड़ना की घटना प्रकाश में आने पर संगठन प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स द्वारा जांच के ज्ञापन पुलिस महानिदेशक पर मुख्य सचिव मध्यप्रदेश को भेजे थे जिसमे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जोन 2 द्वारा पीड़ित पत्रकार के स्थान पर ज्ञाप देने वालों को कथन के नाम पर नोटिस भेज भेजकर प्रताड़ित किया जा रहा है। ऐसे में संगठन द्वारा पत्रकार विरोधी नीति के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए प्रताड़ित करना न्यायसंगत नहीं लगता।परन्तु पत्रकार विरोधी सरकार के आगे कोई न्याय की उम्मीद नहीं लगती।

प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के संस्थापक अध्यक्ष सैयद खालिद कैस ने शिवराज सरकार पर हमला करते हुए कहा कि पत्रकारों के प्रति असंवेदनशील है मध्य प्रदेश की सरकार।शिवराज सरकार ने गैर अधिमान्य पत्रकारों का शोषण कर रखा है।पत्रकार विरोधी जनसंपर्क संचालनालय की नीतियों के कारण प्रदेश भर के हज़ारों पत्रकार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। प्रदेश भर में पत्रकारों के खिलाफ झूठी एफ आई आर होना ,पत्रकारों को प्रताड़ित करने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होना चिंता का विषय है।
