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लेखक लवप्रीत सिंह
असम की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता, चाय बागानों, सांस्कृतिक विविधता और ब्रह्मपुत्र की विराट धारा से नहीं है; उसकी, एक दूसरी पहचान भी है—हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़। यह बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है, बल्कि यह राज्य के लाखों गरीब परिवारों, किसानों, मछुआरों, भूमिहीन मजदूरों और नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए एक स्थायी त्रासदी बन चुकी है। हर वर्ष मानसून के साथ ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ उफान पर आती हैं, गाँव बह जाते हैं, खेत रेत में बदल जाते हैं, पशुधन नष्ट हो जाता है और हजारों परिवार राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हो जाते हैं। यह दृश्य नया नहीं है। पीढ़ियाँ बीत गईं, सरकारें बदलती रहीं, राजनीतिक दलों के चेहरे बदलते रहे, लेकिन ब्रह्मपुत्र का तांडव और उससे जुड़ी मानवीय पीड़ा लगभग वैसी ही बनी रही।
असम की राजनीति में पिछले दो दशकों के दौरान एक महत्वपूर्ण चेहरा हिमंत विश्व शर्मा का रहा है। वे लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहे हैं और पिछले कई वर्षों से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस समस्या को उन्होंने वर्षों तक अपनी आँखों के सामने देखा, उसे स्थायी रूप से हल करने के लिए क्या ठोस प्रयास हुए? क्या असम की सबसे बड़ी मानवीय और आर्थिक चुनौती को राजनीतिक प्राथमिकता मिली? या फिर चुनावी विमर्श ऐसे मुद्दों की ओर मोड़ दिया गया जिनसे भावनात्मक ध्रुवीकरण तो संभव था, लेकिन बाढ़ और विस्थापन जैसी मूल समस्याओं पर गंभीर बहस नहीं हो सकी?
ब्रह्मपुत्र कोई साधारण नदी नहीं है। यह हिमालय से निकलकर असम के विशाल भूभाग को चीरती हुई बहती है। इसकी जलधारा अत्यंत शक्तिशाली है, इसका पाट बहुत चौड़ा है और यह हर वर्ष अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर आती है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि असम की बाढ़ का समाधान केवल तटबंध बनाने से संभव नहीं है। नदी के समग्र प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण, गाद प्रबंधन, वैज्ञानिक तटबंध व्यवस्था, जल निकासी प्रणाली, बाढ़ पूर्व चेतावनी तंत्र, नदी द्वीपों की सुरक्षा, पुनर्वास नीति और दीर्घकालिक नदी प्रबंधन योजना की आवश्यकता है। लेकिन इन विषयों पर जितनी गंभीरता होनी चाहिए थी, वह दिखाई नहीं देती।
हर साल जब बाढ़ आती है, तो सरकारी मशीनरी सक्रिय होती है। राहत सामग्री पहुँचती है, हेलीकॉप्टर से निरीक्षण होता है, मुआवजे की घोषणाएँ होती हैं और कुछ समय बाद जब पानी उतर जाता है, तब यह मुद्दा भी धीरे-धीरे सार्वजनिक बहस से गायब हो जाता है। अगले वर्ष फिर वही चक्र दोहराया जाता है। प्रश्न यह है कि क्या एक ऐसे राज्य के लिए, जिसकी अर्थव्यवस्था, कृषि, आवास और सामाजिक संरचना बाढ़ से गहराई से प्रभावित होती है, यह स्वीकार्य स्थिति है?
असम के किसान इस त्रासदी के सबसे बड़े शिकार हैं। उनके लिए बाढ़ केवल कुछ दिनों की परेशानी नहीं होती, बल्कि यह पूरे वर्ष की मेहनत को मिटा देती है। धान की फसल नष्ट हो जाती है, सब्जियाँ बह जाती हैं, खेतों पर रेत की मोटी परत जम जाती है और अगले मौसम की खेती भी संकट में पड़ जाती है। जिन किसानों के पास थोड़ी-बहुत जमीन होती है, वे कर्ज में डूब जाते हैं। जिनके पास जमीन नहीं होती, वे दिहाड़ी मजदूरी या पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं। कृषि बीमा की सीमाएँ, मुआवजे की अपर्याप्त राशि और पुनर्वास की धीमी प्रक्रिया उनके जीवन को और कठिन बना देती है।
ब्रह्मपुत्र के किनारे रहने वाले गरीब परिवारों की स्थिति और भी दयनीय है। नदी कटाव असम की एक गंभीर समस्या है। हजारों परिवारों की जमीन हर वर्ष नदी में समा जाती है। जिन लोगों के पास कभी खेत, घर और आजीविका थी, वे धीरे-धीरे भूमिहीन हो जाते हैं। उनका सामाजिक और आर्थिक आधार समाप्त हो जाता है। विस्थापन केवल भौतिक नहीं होता; यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक पहचान पर भी गहरा प्रभाव डालता है। बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, महिलाएँ असुरक्षित परिस्थितियों में राहत शिविरों में रहने को मजबूर होती हैं और बुजुर्गों के लिए जीवन और कठिन हो जाता है।
ऐसी स्थिति में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बाढ़ और नदी प्रबंधन होना चाहिए। लेकिन पिछले वर्षों में असम की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा पहचान, नागरिकता, समुदाय और सांप्रदायिक विमर्श के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। ‘मिया’ समुदाय को लेकर बयान, अवैध प्रवासन का प्रश्न, जनसंख्या संतुलन की बहस, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक केंद्र में रहे। इन विषयों पर चर्चा लोकतंत्र का हिस्सा हो सकती है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन बहसों ने ब्रह्मपुत्र की त्रासदी को पीछे धकेल दिया?
जब किसी राज्य की सबसे बड़ी प्राकृतिक और आर्थिक चुनौती राजनीतिक विमर्श के केंद्र से हट जाती है, तब उसके समाधान की संभावना भी कमजोर पड़ जाती है। जनता का ध्यान भावनात्मक मुद्दों की ओर मोड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि उससे तत्काल राजनीतिक लाभ मिल सकता है। लेकिन बाढ़ प्रबंधन जैसे विषयों में दीर्घकालिक योजना, भारी निवेश, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय समन्वय, प्रशासनिक सुधार और लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है। यह कठिन और कम आकर्षक राजनीतिक कार्य है।
असम के चाय बागान राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। वहाँ काम करने वाले मजदूरों की समस्याएँ भी वास्तविक हैं—कम मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं। लेकिन यदि इन समुदायों के नाम पर राजनीति होती रहे और उनके जीवन की बुनियादी समस्याएँ जस की तस रहें, तो यह भी एक गंभीर प्रश्न है। चाय बागान मजदूरों और बाढ़ प्रभावित किसानों की समस्याएँ परस्पर विरोधी नहीं हैं; दोनों ही राज्य की विकास नीति के केंद्र में होने चाहिए।
हिमंत विश्व शर्मा एक प्रभावशाली और सक्रिय राजनीतिक नेता माने जाते हैं। प्रशासनिक निर्णय लेने की उनकी क्षमता की चर्चा होती है। यदि ऐसा है, तो यह अपेक्षा और भी बढ़ जाती है कि वे असम के लिए एक व्यापक नदी और बाढ़ प्रबंधन मॉडल प्रस्तुत करते। पिछले वर्षों में राज्य सरकार ने कुछ परियोजनाएँ शुरू की हैं, तटबंधों के निर्माण और मरम्मत पर खर्च हुआ है, लेकिन हर वर्ष बाढ़ की व्यापकता और उससे होने वाली क्षति यह संकेत देती है कि समस्या का संरचनात्मक समाधान अभी दूर है।
ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को केवल प्राकृतिक नियति मान लेना उचित नहीं है। दुनिया के अनेक देशों ने बड़ी नदियों के साथ वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से आपदाओं को काफी हद तक नियंत्रित किया है। नीदरलैंड ने समुद्र और नदियों से संघर्ष करते हुए आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली विकसित की। बांग्लादेश ने बाढ़ पूर्व चेतावनी और सामुदायिक तैयारी में उल्लेखनीय सुधार किए। भारत के अन्य राज्यों में भी नदी प्रबंधन के विभिन्न मॉडल विकसित हुए हैं। असम के लिए भी एक विशिष्ट और वैज्ञानिक मॉडल तैयार किया जा सकता है, क्योंकि उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग हैं।
इसमें केंद्र सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ब्रह्मपुत्र एक अंतरराष्ट्रीय नदी है। चीन, अरुणाचल प्रदेश, असम और बांग्लादेश से जुड़ी इसकी जटिलता को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है। लेकिन राज्य सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। उसे लगातार वैज्ञानिक संस्थानों, नदी विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों, इंजीनियरों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करना होगा।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—डेटा और पारदर्शिता का। हर वर्ष बाढ़ से कितनी कृषि भूमि प्रभावित हुई, कितने परिवार स्थायी रूप से विस्थापित हुए, नदी कटाव से कितनी जमीन नष्ट हुई, तटबंधों की स्थिति क्या है, किन परियोजनाओं पर कितना खर्च हुआ और उनका परिणाम क्या निकला—इन सब पर सार्वजनिक और पारदर्शी मूल्यांकन आवश्यक है। लोकतंत्र में जवाबदेही केवल चुनाव जीतने से पूरी नहीं होती; वह नीतिगत परिणामों से तय होती है।
बाढ़ के समय राहत शिविरों की तस्वीरें अक्सर मीडिया में दिखाई देती हैं। बच्चे प्लास्टिक की चादरों के नीचे बैठे हैं, महिलाएँ सीमित संसाधनों में भोजन बना रही हैं, पशु अलग बंधे हैं और बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे जो लंबी कहानी है, वह कम दिखाई देती है। राहत शिविर से घर लौटने के बाद लोगों का संघर्ष शुरू होता है। घर टूट चुका होता है, खेत बर्बाद हो चुके होते हैं और भविष्य अनिश्चित होता है। यह केवल आपदा प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का प्रश्न है।
असम की जनता ने विभिन्न सरकारों को अवसर दिए हैं। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन और नेतृत्व परिवर्तन का उद्देश्य केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं होता; उसका उद्देश्य बेहतर शासन भी होता है। यदि दशकों पुरानी समस्या आज भी उसी तीव्रता के साथ मौजूद है, तो उसकी समीक्षा आवश्यक है। किसी भी सरकार की आलोचना का अर्थ यह नहीं कि समस्या पूरी तरह उसी की देन है। लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेतृत्व से परिणामों के आधार पर प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक दायित्व है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि बाढ़ और पर्यावरण का संबंध गहरा है। वनों की कटाई, पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण, नदी तटों का अतिक्रमण, जल निकासी मार्गों का अवरोध और जलवायु परिवर्तन बाढ़ की तीव्रता को प्रभावित करते हैं। इसलिए समाधान केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं से नहीं आएगा; इसके लिए पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास की नीति भी आवश्यक है।
राजनीति का उद्देश्य समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान होना चाहिए। यदि चुनावी भाषणों में समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ाने वाले मुद्दे प्रमुख हो जाएँ और किसानों, मजदूरों, विस्थापित परिवारों और बाढ़ प्रभावित बच्चों की आवाज़ पीछे छूट जाए, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है। असम जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण राज्य में सामाजिक सद्भाव और विकास दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।
ब्रह्मपुत्र का तांडव हर वर्ष हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति के सामने राजनीतिक नारों की सीमाएँ होती हैं। नदी यह नहीं पूछती कि कौन किस समुदाय से है, किस भाषा को बोलता है या किस धर्म को मानता है। वह सबको समान रूप से प्रभावित करती है। इसलिए उसका समाधान भी समावेशी और वैज्ञानिक होना चाहिए। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में रहने वाला किसान, मछुआरा, चाय बागान मजदूर, आदिवासी, बंगाली, असमिया, हिंदू, मुसलमान—सभी की पीड़ा एक जैसी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि असम की राजनीति ब्रह्मपुत्र को केवल एक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक नीति चुनौती के रूप में देखे। राज्य को एक ऐसी व्यापक नदी नीति चाहिए जो अगले पचास वर्षों की दृष्टि से बनाई जाए। तटबंधों की गुणवत्ता, नदी कटाव नियंत्रण, गाद प्रबंधन, जल निकासी, पुनर्वास, कृषि पुनर्निर्माण, जलवायु अनुकूल खेती, सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक अनुसंधान को एकीकृत करना होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।
असम की जनता को भी यह प्रश्न बार-बार उठाना होगा कि हर वर्ष बाढ़ क्यों आती है, हर वर्ष वही जिले क्यों डूबते हैं, हर वर्ष वही परिवार क्यों विस्थापित होते हैं और हर वर्ष राहत की राजनीति क्यों दोहराई जाती है। जब तक जनता मूल मुद्दों को राजनीतिक प्राथमिकता नहीं बनाएगी, तब तक चुनावी विमर्श आसानी से दूसरी दिशाओं में मोड़ा जाता रहेगा।
ब्रह्मपुत्र असम की जीवनरेखा है, लेकिन वह उसके दुख का सबसे बड़ा स्रोत भी बन गई है। इस विरोधाभास को समाप्त करना ही असम की सबसे बड़ी विकास परियोजना होनी चाहिए। इतिहास नेताओं को उनके भाषणों से कम और उनके द्वारा हल की गई समस्याओं से अधिक याद रखता है। यदि असम को वास्तव में एक सुरक्षित, समृद्ध और न्यायपूर्ण राज्य बनाना है, तो ब्रह्मपुत्र की बाढ़ और उससे जुड़े मानवीय संकट को राजनीति के केंद्र में लाना ही होगा। यही असम के किसानों, गरीब परिवारों और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
