भोपाल। देश में मीडिया का एक वर्ग परोक्ष या अपरोक्ष रूप से मुसलमानों की छबि खराब करने का प्रयास कर रहा है। इसमें मीडिया के कुछ स्वार्थ जुड़े हुए हैं, लेकिन आज का समाज सोशल मीडिया के सहारे मीडिया की वास्तविकता सामने ला सकता है। यह विचार रविवार को एसोसिएशन ऑफ इंडियन मुस्लिम की जानिब से राजधानी के गांधी भवन में आयोजित सेमिनार के दूसरे दिन ‘मीडिया और मुसलमानÓ विषय पर बोलते हुए देश के मशहूर पत्रकारों ने व्यक्त किए।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्रीमती मैमूना अब्बास ने साफ लफ्जों में कहा कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरे सेट एजेंडे के तहत मुसलमानों की छबि को धूमिल कर रहा है। उन्होंने कहा मीडिया का यह कृत्य संविधान और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विपरीत है, यह रूझान देश की जम्हूरियत के लिए खतरनाक है। श्रीमती मैमूना अब्बास ने मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक परेशानियों के सिलसिले में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि ये मसला सिर्फ मुसलमानों का नहीं, बल्कि समाज में और भी वर्गों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। संविधान ने सभी को बराबरी के हक दिए हैं, लेकिन जो भी हुकूमतें आती हैं, असल मुद्दों से ध्यान भटकाकर गैर अहम मुद्दों को चर्चा में लाती हैं। मीडिया का एक हिस्सा इसमें अहम रोल अदा कर रहा है। उन्होंने तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम समाज में मचे बबाल को लेकर कहा कि तीन तलाक को आप विदअत मानते हैं, तो उसके खिलाफ बनने वाले कानून को लेकर इस्लाम खतरे में है का नारा क्यों बुलंद करते हैं। तलाक एक बुराई है तो उसे खुद खत्म करें। उन्होंने मुस्लिम लड़कियों को हर तरह की तालीम और प्रोफेशन अपनाने की नसीहत दी।
राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केशवानी ने कहा कि हॉं, ये बात सच है कि मीडिया दो हिस्सों में बंट चुका है। संघ विचारधारा के लोगों का मीडिया दखल बढ़ चुका है। वो उसी सेट एजेंडे के साथ चीजों को परोस रहे हैं, ये सबकुछ इतने सेटल तरीके से हो रहा है कि आप जानकार भी उस पर कुछ नहीं कर सकते। श्री केशवाणी ने इस पर क्षोभ व्यक्त किया कि इलेक्ट्रानिक हो या पिं्रट मीडिया मुसलमानों के सकारात्मक सम्मेलनों को कवरेज नहीं दे रहा। जबकि नाच-गाने की महफिलों को आधे-आधे पेज में छापा जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्वच्छ पत्रकारिता के सिद्धांतों के विपरीत है। समाज को इस विषय में संजीदगी से गौर करने की जरूरत है।
दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली ने हिंदुस्तान को कई धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों वाला महान देश निरूपित करते हुए कहा कि भारत दुनिया का अनमोल रतन है। यहां तमाम तहजीबें फली-फूलीं, उन्होंने कहा कि लगभग एक हजार साल पहले बाहर से जो मुसलमान भारत आए वो यहीं के हो रहे। आज उन्हीं की नस्लों से लाखों मुसलमान देश के नागरिक हैं। मीडिया और मुसलमानों के रिश्तों को इस्लाम के चश्में से नहीं देखने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि देश के बंटवारे के बाद हमारा जो संविधान बना वो सेक्युलर सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें सभी धर्मों-वर्गों को हक दिए गए हैं। देश के बंटवारे को उन्होंने काला अध्याय बताते हुए कहा कि मजहब के नाम पर हुआ बंटबारा पाकिस्तान और वहां के मुसलमानों के लिए नासूर बन गया है। उन्होंने कहा कि मुझे यह कहते हुए कोई झिझक नहीं कि पाकिस्तान और इजराईल ही दुनिया के दो ऐसे देश हैं जो नाजायज हैं। क्योंकि ये नफरत की बुनियाद पर कायम किए गए हैं। हमारा राष्ट्र सेक्युलर है और सेक्युलर ही रहेगा। जैसा हमने आजादी के समय संविधान में प्रावधान किया है। स्वतंत्रा संग्राम के हवाले से उन्होंने कहा कि दूसरी जमात के लोगों ने आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया लेकिन वो हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, लेकिन मेरा विश्वास है कि ऐसा नहीं होगा। उन्होंने इस पर अफसोस जाहिर किया कि मीडिया में मुसलमानों को अपराधी, अनपढ़, आतंकी मानसिकता वाले व्यक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है। यह लोग बड़ी चतुराई से इस बात को कह जाते हैं कि लोगों को बुरा भी नहीं लगता और उनका एजेंडा भी पूरा हो जाता है। हालांकि अभी भी मीडिया में बहुत से लोग ईमानदारी से काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों की पहचान कर उनका सम्मान करें। उन्होंने सलाह दी कि मीडिया की किसी नाकारात्मक खबर को आप सोशल मीडिया के सहारे नकार सकते हैं।
वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक रशीद किदवई ने अपने पूर्व वक्ताओं की कई बातों से सहमति व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी माना कि आज के मीडिया में ऑनरशिप और कंट्रोल महत्वपूर्ण हो गया है। मीडिया कामर्शियल प्रोडक्ट की तरह हो गया है। लेकिन मीडिया समाज का दर्पण है, समाज की समस्याएं , समाज में बिखराव को रिफलेक्ट करती है।
मीडिया की दूसरी समस्या यह है कि ज्यादातर लोग ओपन एंट्री से आते हैं, बहुत कम लोग हैं, जो प्रोफेशनल ट्रेनिंग के जरिये आते हैं। जो लोग ओपन एंट्री करते हैं, वह ज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते और उनके दिलो-दिमाग पर आसपास के वातावरण का गहरा प्रभाव रहता है। जिसकी वजह से खबरों में पारदर्शिता नहीं रहती। मेन स्ट्रीम के मीडिया में मुसलमानों को जानबूझकर नीचा दिखाने की कोई साजिश नहीं होती। उन्होंने तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हुए सोशल मीडिया की उपयोगिता बताई।
नौजवान पत्रकार दीप हलधर ने विषय पर बोलते हुए कहा कि मीडिया को अपने फर्ज के प्रति ईमानदार और निष्पक्ष होना चाहिए। चीजों को अपनी यथा स्थिति में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपराध कोई भी करे, वो अपराधी है। उसका समाज या धर्म से कोई संबंध नहीं है। किसी भी खबर को धर्म के आईने में परखना समझदारी नहीं। मीडिया की भूमिका किसी मुद्दे को उठाना है न कि किसी समाज की बुराई करना। इस मामले में उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वह न तो मीडिया की खबरों से उत्तेजित हों न ही निराश हों। अफेक्टिव एप्रोच के साथ फेयरलेस बनें।
इससे पूर्व संस्था के अध्यक्ष उबैस अरब और अन्य सदस्यों ने मेहमानों का गुलदस्ता पेश कर इस्तकबाल किया। संचालन इफ्तेखार अय्यूब ने किया। जबकि आभार प्रदर्शन ताहिरा अरब द्वारा किया गया। सम्मेलन में काफी तादाद में महिला और पुरूष मौजूद थे।
कार्यक्रम के पहले सत्र में इस्लाम और सांइस विषय पर प्रो जफर अहसन और डा.शाहिद ने प्रजेंटेशन के साथ अपनी बात रखी। इस अवसर पर शहर के प्रमुख धर्मगुरु मौलाना पीर सिराजउल हसन साहब ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। जिसमें उन्होंने खास तौर से लड़कियों की तालीम पर जोर दिया। उन्होंने सलाह दी कि बेटियों को शिक्षक और मेडिकल पेशा अपनाना चाहिए, जो महिलाओं के लिए हर तरह से सुरक्षित होने के साथ ही कल्याणकारी है।
मुशाहिद / अनवर खान
