मप्र : छतरपुर जिले में 1 रुपये में भर पेट भोजन
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कॉग्रेस विधायक पज्जन चाचा की
जनता को भरपेट भोजन का उपहारराजेन्द्र वर्मा ( वरिष्ठ पत्रकार) भोपाल
अभी प्रदेश में विधानसभा चुनाव काफी दूर हैं। लेकिन लोग चाचा की रसोई से खासे प्रभावित दिखाई दे रहे हैं। इसी विधानसभा चुनाव के पहले “चाचा टैंकर वाले ” के नाम से विधायक पज्जन चाचा खासे लोकप्रिय हो चुके हैं। नगरपालिका के होते हुए भीषण गर्मी में चाचा घर-घर टैंकर पहुंचा चुके हैं। जिसके चलते छतरपुर विधानसभा सीट से पज्जन चाचा चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। हालांकि विधायक बनने के बाद चाचा पर जातिवाद और जन उपेक्षा के आरोप लगने लगे। कांग्रेस की सरकार रहते हुए चाचा जन अनुरूप कार्य नही कर पाए। राजनीति में माहिर चाचा की विपक्ष में रहते हुए सकारात्मक भूमिका रहती है। कह सकते हैं कि अपने बड़े भाई कॉंग्रेस के दिग्गज नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी से विरासत में मिली राजनीति में छतरपुर जिले से ही नही मप्र में कद्दावर राजनेता के रूप में छाप छोड़ने में सफल हो गए। पेशे से प्रदेश के नामी गिरामी उद्योगपति के रूप में भी जाने जाते हैं। कमलनाथ के करीबी भरोसेमंद राजनेता हैं। खासबात यह है कि ये हवा का रुख जानते हैं। हारी बाजी को जीत में बदलने का माद्दा रखते हैं। अभी विधानसभा चुनावों में करीब दो साल का समय बांकी है। चाचा की रसोई यानि एक रुपये में भरपेट भोजन इस समय गरीबों के लिए संजीवनी साबित हो रही है। जो काम सरकार यहां नही कर पाई उस काम की शुरुआत चाचा ने कर दी है। गरीबों का मानस बदलने चाचा की रसोई कारगर दिखाई दे रही है। प्रतिदिन सैकड़ों लोग एक रुपये में भोजन कर पेट की आग शांत कर रहे हैं। हालांकि,चाचा की रसोई को लेकर अन्य सियासी दल तरह तरह की बातें कर रहे हैं। कोई इसे चुनावी विसात बता रहे हैं तो कोई जनता के जले पर मरहम बता रहे हैं। बहरहाल,लोग इसे चाचा का पुनीत कार्य बताकर खुश हैं। तो भाजपा इसकी काट खोजने में जुटी है। अब देखना होगा कि चाचा की रसोई आगामी चुनावों में चाचा की नैया पार लगाएगी कि नही। जिले की अधिकांश सीटें कांग्रेस के खाते में हैं,लेकिन कांग्रेस अभी तक मुख्य विपक्ष की भूमिका नही निभा पाई है। चाहे मेडिकल कॉलेज का मसला हो या फिर छत्रसाल महाराजा कॉलेज के यूनिवर्सिटी में विलय का। अभी आकाशवाणी सहित एक दर्जन सौगातें छतरपुर से छिन चुकी हैं। इसके लिए आंशिक आंदोलन तो हुए लेकिन गति नही पकड़ पाए। जिले में अफसर माफिया के खिलाफ आंदोलन तो दूर विरोध भी कांग्रेस नही कर पा रही है। यह बात सही है कि अफसरों की करनी शिवराज सरकार के लिए एक बार फिर मुसीबत का सबब बनती जा रही है। छतरपुर जिले में भाजपा की पराजय के चलते ही कमलनाथ की सरकार बनी थी। लगता है कि अफसरों की माफियागिरी,भ्रष्टाचार भाजपा की लोकप्रियता को गिराने में मुख्य किरदार निभा रही है। जो शिवराज सरकार को चिंता का सबब बन सकती है।
