बात उस समय की है जब दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उस दौरान करीब पांच वर्षों तक उनके राज्यपाल से मतभेद रहे।
इस मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई में साफ किया कि उपराज्यपाल को कैबिनेट की सलाह पर काम करना होगा. कोर्ट ने साथ ही कहा कि उपराज्यपाल अगर कैबिनेट की किसी सलाह पर सहमत नहीं, तो फिर वह कारण बताते हुए इसे राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं.
इस मौके पर न्यूज18 आपको मध्य प्रदेश में एक ऐसे वाकये के बारे में बताने जा रहा है, जब यहां के राज्यपाल और मुख्यमंत्री में जमकर टकराव हुआ था. बात उस समय की है जब दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.
उस दौरान करीब पांच वर्षों तक उनके राज्यपाल से मतभेद रहे. इस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले भाई महावीर मध्य प्रदेश के राज्यपाल थे और 1998 से लेकर 2003 तक राजभवन और मुख्यमंत्री के बीच टकराव की स्थिति बनी रही.
दरअसल, उस दौरान विश्वविद्यालयों को लेकर ज्यादा विवाद होता रहता था. यहां तक कि एक बार विवाद इतना बढ़ गया था कि दिग्विजय सरकार ने राज्यपाल के अधिकार कम करने के लिए विधानसभा में कानून तक पारित कर दिया था.
उस दौरान इस मामले को नजदीक से देखने वाली वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शिफाली पांडेय इस मामले को आज के परिप्रेक्ष्य में जोड़कर कहती हैं कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव होना कोई नई बात नहीं है. वो मिसाल देते हुए कहती हैं यह स्थिति आज भी बनी हुई है. एक ही पार्टी के होने के बावजूद भी मध्य प्रदेश में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच अफसरों को आदेश देने संबंधी निर्णयों में ऐसी स्थिति देखने को मिल जाती है.।
