परवेज़ इक़बाल की क़लम से
हमेशा चर्चा में रहने वाले मस्ज़िद-मदरसों को लेकर हाल ही मैं दो मामले ऐसे देखने मे आये हैं जिन पर काफी कुछ लिखा-कहा-सुना गया..पहला मामला इंदौर के स्थानीय मामला है जहां खजराना की एक मस्जिद में रिवायतों को तोड़ कर जुमे में एक मशहूर हार्ट स्पेशलिस्ट डॉक्टर को तकरीर के लिए बुलाया गया..दूसरा मामला संघ नेता इंद्रेश का देवबंद के मदरसे में जाना भी चर्चा का विषय बना..बातें बहुत बनाई गईं…पक्ष में भी और विपक्ष में भी…विपक्षियों ने बेहूदा तर्क दिए…डॉक्टर या इंद्रेश खुद आये या बुलाया गया ये सवाल भी उठाया गया….मेरा मानना है इससे क्या फर्क पड़ता है कि वो खुद आये या उन्हें बुलाया गया…मैं तो कहता हूं कि खुद आने से बेहतर है कि उन्हें या उन जैसों को बुलाया जाए..इनकी आमद पर सवाल उठाने वाले ये कियूं भूल जाते हैं कि इस्लाम महज़ मुसलमानों का नहीं बल्कि इंसानों का मज़हब है…उनके नबी सल्ल. रहमतुललिल मुस्लेमीन (मुसलमानों के लिए रहमत) बन कर नहीं बल्कि रहमतुललिल आलमीन(सारी दुनिया के लिए रहमत) बन कर आये हैं…लेकिन दकियानूसी चंदेबाज़ धंधेबाज कठमुल्लों ने मस्जिद मदरसों के आस पास अदृश्य दीवारें उठा कर उन्हें इस तरह क़िलों में तब्दील कर इनकी एंट्री इतनी दूभर कर दी है कि इनमें गैर मुस्लिम तो क्या खुद आम मुस्लिम भी सहज रूप से आना-जाना नहीं कर सकता..इस्लाम से पूर्वाग्रह रखने वाले लोगों ने इस बात को इस्लाम के खिलाफ हथियार की तरह इस्तमाल किया और नतीजतन ग़ैरमुस्लिमो के मन मे इस्लाम/मस्जिद/मदरसों को लेकर कई भ्रांतियां बैठ गयी जो वक़्त के साथ साथ और गहरी होती चली गईं…आज मदरसों को आतंक से जोड़ने की आम भ्रांति के लिए भी हमारे ज़िद्दी धर्मगुरुओं हठधर्मिता ही जिम्मेदार है जिन्होंने इस्लाम को अपनी टोपी पगड़ी में छुपाने ढंकने का कुत्सित प्रयास किया..इस्लाम को मस्जिद मदरसे के चंदे और रोज़ा नमाज़ तक ही महदूद कर दिया जबकि इस्लाम एक मुकम्मल दिनचर्या का नाम है जिसने सोने, उठने,बैठने,कारोबार करने,परिवार चलाने,तालीम हासिल करने यहां तक शौच के लिए जाने तक का तरीका बताया गया है…पड़ोसी धर्म, पर्यावरण, सद्भावना, दलित उत्थान,शिक्षा, अर्थव्यवस्था, कन्या भूर्ण हत्या, महिला उत्थान जैसे लगभग तमाम विषयों पर इस्लाम के अनुकरणीय पहलुओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने में मुस्लिम धर्मगुरु नाकाम रहे…आज जिन समस्याओं से दुनिया दो-चार हो रही है उनके समाधान इस्लाम मे मौजूद हैं ये बात दुनिया के सामने कियूं सही तरीके से पेश नहीं कि जाती…भारत सहित किसी भी देश के संविधान में जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं वो इस्लाम का अभिन्न हिस्सा हैं ये बात दुनिया को इस्लाम के अनुयायी कियूं नहीं बता सके….अब वक्त आ गया है कि मस्ज़िद-मदरसों की अदृश्य दीवारों को तोड़ कर उनमें नए दरवाज़े-दरीचे बनाये जाएं.. इन दरवाजों से सिर्फ मुस्लिम ही नहीं गैर मुस्लिमों का भी बाहें फैला कर खेर-मकदम किया जाए…एक विधिवत कार्यक्रम बनाया जाए जिसके तहत गैर मुस्लिमों यहां तक कि इस्लाम से पूर्वाग्रह रखने वाले संघठनों,राजनैतिक दलों,मीडिया से जुड़े लोगों को मस्ज़िद मदरसों में विजिट करवाई जाए…यहां होने वाली तकरीरों के वक़्त उन्हें बतौर मेहमान ससम्मान बुलाया जाए…ताकि वो इस्लाम के प्रति पूर्वाग्रह से निजात पा सकें…मस्जिद मदरसों में जुमे के बयान और ख़ुत्बे में सिर्फ रोज़ा-नमाज़ का ही ज़िक्र न हो बल्कि पर्यावरण,महिलाओं की स्थिति,कन्या भूर्ण,अर्थव्यवस्था,दलित उत्थान पर इस्लामी नुक्ता-नज़र पर भी रोशनी डाली जाए…..ताकि आपकी क़ोम के नॉनिहालों सहित दुनिया को पता चल सके कि जिस दलित उत्थान के लिए आज सरकारें परेशान हैं उस दलित उत्थान के सन्देश अल्लाह के नबी ने 1400 साल पहले दिया था जब मोहम्मद सल्ल. ने अछूत समझे जाने वाली गुलाम नस्ल के हज़रत हब्शी रह. को अपने कांधे पर उठा कर पवित्र क़ाबे पर खड़ा अज़ान दिलवाई थी….दुनिया को बताया जाए कि जिस कन्या भूर्ण हत्या,महिलाओं के शोषण या बलात्कार की घटनाओं से आज दुनिया खुदको बेबस पा रही है इस्लाम पहला मज़हब था जिसने कन्या भूर्ण हत्या को पाप बता कर इसे सख्ती से रोका, महिलाओं को सम्पत्ति में हिस्सेदारी का धार्मिक कानून बनाया और बलात्कारी को संगसार कर सज़ा-ऐ-मौत का प्रावधान किया..जिस पर्यावरण की चिंता में आज सारी दुनिया की पेशानी पर बल पड़े हैं उस पर्यावरण को लेकर हज़ारों साल पहले ही इस्लाम की सजगता का ये आलम था कि अल्लाह के नबी ने अनाज पानी सहित तमाम प्राकृतिक संसाधनों का अल्लाह द्वारा हिसाब लेने की बात कह कर मितव्यता(कम खर्च) की बात कही..अल्लाह के नबी का क़ोल था कि “अगर मेरे हाथ मे एक खजूर की गुठली हो और मुझे पता चला जाये कि अगले पल प्रलय/क़यामत आने वाली है फिर भी मैं उस गुठली को ज़मीन में बो दूंगा”..आज प्रदूषण के चलते कल-कारखानों को शहर से बाहर करने की यौजना बनाई जा रही है जबकि हज़रत उमर फारुख(रजी.) ने हजारों साल पहले प्रदूषण की समस्या भांप कर एक लोहार की भट्टी को शहर से बाहर शिफ्ट करवा कर इस मामले में इस्लाम का पहलू बता दिया था…कारोबार पर इस्लामी नज़रिए की बात करें तो इस्लाम मे जमाखोरी और और एक सीमित मुनाफे से ज़्यादा मुनाफा लेने की सख्त मनाही की है ताकि महंगाई न बढ़ सके…ज़कात के रूप में एक बेहतर टेक्स व्यवस्था और गरीबों की मदद का प्लान दुनिया मे मजबूत अर्थव्यवस्था का जरिया हो सकता है ये बात हम दुनिया को कियूं नहीं बताते…अपने पर कचरा डालने वाली औरत की तबियत पूछने जाना हो या खुद को गाली देने वाली बुढ़िया का बोझ उठाना हो..अल्लाह के नबी की सादा मिजाजी,नर्म दिली और सब्र की मिसाल को हम दुनिया के सामने कियूं न रखें…दुनिया को कियूं न बताया जाए इस्लाम कहता है कि अगर आपका गैर मुस्लिम पड़ोसी भी भूखा है तो उसके भोजन की व्यवस्था किये बगेर खुद आपका खाना हराम है…कुल मिला कर मोहब्बत भाई चारे अमनो अमान के साथ दुनिया की तमाम परेशानियों का हल रखने वाले मज़हब को अब मस्ज़िद-मदरसे की चार-दिवारी की क़ैद से निकाल कर इसे आमजन तक पहुंचाने का वक़्त आ चुका है…लिहाज़ा मस्जिद-मदरसों की अदृश्य दीवारों को तोड़ कर इनके दरवाज़े हर धर्म/हर मज़हब के लिए खोले जाएं यही दुनिया के हक़ में है, यही इस्लाम के हक़ में है और यही सच्ची तबलीग भी है…।
(परवेज़ इक़बाल) इन्दौर प्रेस क्लब के सदस्य एवं मप्र के वरिष्ठ पत्रकार है ।
