सैयद ख़ालिद कैस समूह सम्पादक @8770806210
भोपाल । विगत दो दिन से देश की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किये गये महत्तवपूर्ण फैसलों में से एक भारतीय दंड विधान की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर 158 साल से पुरुषों पर हो रहे भेदभाव से आज़ादी का आदेश है । देश भर में इस फ़ैसले पर अलग अलग तरीके से लोग अपने विचार रख रहे है , बहुत बड़े तबके का मानना है कि धारा 377 ( अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध ) बाद धारा 497(व्यभिचार )को असंवैधानिक घोषित किया जाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देना है । बैशक यह धारणा सही है । मैं इस बात पर भारतीय संस्कृति के साथ हूँ , परन्तु केवल धारा 377 मामले में ! रही बात धारा 497 की , तो सुप्रीम कोर्ट का कल का फ़ैसला अपने आप में महत्तवपूर्ण हैं , इसलिये नही कि इससे व्यभिचार को कानूनी मान्यता मिल गई बल्कि इसलिये क्योंकि इस धारा 497 का दंड पिछले 158 साल से केवल पुरूष भोग रहा था जिससे उसको अब निजात मिल गई ।इस धारा के दंड से केवल पुरूष दण्डित होता था जबकि अपराध में दोनो (पुरूष और महिला) बराबर के भागीदार होने के बावजूद महिला को अबला और निर्दोष कहकर बख्श दिया जाता था और पुरूष दंड भोगता रहा पिछले 158 वर्ष से ।
क्या है धारा 497 – भारतीय दंड विधान की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा. यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा. इस अपराध के लिये पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था।
संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया. यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरूष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गयी थी।
याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 497 का प्रावधान पुरूषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14:समता के अधिकारः , 15:धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहींः और अनुच्छेद 21:दैहिक स्वतंत्रता का अधिकारः का उल्लंघन होता है।
जस्टिस मिश्रा, जस्टिस ए. एम. खानविलकर, जस्टिस आर. एफ. नरीमन, जस्टिस डी. वाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस इन्दु मल्होत्रा की पीठ ने गुरुवार को कहा कि व्यभिचार के संबंध में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है।
बता दें कि इससे पहले 8 अगस्त को हुई सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि एडल्टरी अपराध है और इससे परिवार और विवाह तबाह होता है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली संवैधानिक बेंच ने सुनवाई के बाद कहा था कि मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा ।
फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, ‘IPC की धारा सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है. महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए. महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.’
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा फैसला देते हुए एडल्टरी (व्यभिचार) को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है. कोर्ट ने एडल्टरी (व्यभिचार) मामले में IPC की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया है. भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस आरएफ नरीमन, डीवाई चंद्रचूड़ और एक मात्र महिला जज इंदु मल्होत्रा ने सर्वसम्मति से सेक्शन 497 को असंवैधानिक करार दिया. आइए, जानते हैं फैसला सुनाते वक्त जजों ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) दीपक मिश्रा
संविधान की खूबसूरती यही है कि उसमें ‘मैं, मेरा और तुम’ सभी शामिल हैं.’ CJI ने कहा, ‘अडल्टरी तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन यह अपराध नहीं होगा.’
एक लिंग के व्यक्ति को दूसरे लिंग के व्यक्ति पर कानूनी अधिकारी देना गलत है. इसे शादी रद्द करने का आधार बनाया जा सकता है, लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है.’
‘IPC की धारा सेक्शन 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है. महिलाओं को हमेशा समान अधिकार मिलना चाहिए. महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता.’
पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है. संसद ने भी महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा पर कानून बनाया हुआ है.’
क्या महिला रख सकती है विवाहेतर संबंध? सुप्रीम कोर्ट बेंच में असहमति
जस्टिस एएम खानविलकर
‘एडल्टरी किसी तरह का अपराध नहीं है, लेकिन अगर इस वजह से आपका पार्टनर खुदकुशी कर लेता है, तो फिर उसे खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है.’
चीन, जापान, ब्राजील में ये एडल्टरी अपराध नहीं है. ये पूरी तरह से निजता का मामला है. एडल्टरी ‘अनहैपी मैरेज’ का केस भी नहीं हो सकता, क्योंकि अगर इसे अपराध मानकर केस करेंगे, तो इसका मतलब दुखी लोगों को सजा देना होगा.’
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़
एडल्टरी कानून मनमाना है. यह महिला की सेक्सुअल चॉइस को रोकता है और इसलिए असंवैधानिक है. महिला को शादी के बाद सेक्सुअल चॉइस से वंचित नहीं किया जा सकता है.’
जस्टिस रोहिंटन नरीमन
‘एडल्टरी संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है. IPC 497 अपने आप में मनमानी है.’
जस्टिस इंदु मल्होत्रा
‘कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.।
