भोपाल -भ्रष्टाचार उजागर करने और जाँच करने की मांग करना अब अपराध हो गया है । अधिकारी अपने ज़िले में हुऐ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के स्थान पर भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को जैल की हवा ख़िला रहे हैँ । यही देखने में आया मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में जनसुनवाई के दौरान गणवेश घोटाला मामले में कार्रवाई की मांग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा के तहत मामला दर्ज किया गया है। शिवपुरी स्कूल यूनिफार्म घोटाला मामले में इससे पहले भी कार्रवाईयां हो चुकीं हैं। तत्कालीन DPC शिरोमणि दुबे की भी तत्कालीन कलेक्टर से झड़प हो गई थी। इस सबसे भलीभांति परिचित कलेक्टर को मामले की गंभीरता को देखते हुऐ सामाजिक कार्यकर्ता का उत्साहवर्धन करना चाहिऐ था , परन्तु उनको यह बात इतनी नगावार गुजरी की उन्होने मामला को शासकीय कार्य में बाधा बनाकर अपने चपरासी के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ एफआईआर ही करा डाली ।
क्या है पूरा मामला –
कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन अपने एक साथी को लेकर पालक संघ की ओर से पहुंचा। कलेक्टर अनुग्रहा पी. को लिखित शिकायत सौंपते हुए कहा कि स्कूलों छात्र-छात्राओं के लिए स्कूल ड्रेस गुणवत्तायुक्त नहीं दी है। बच्चों को ड्रेस छोटी आ रही है। इसे लेकर कलेक्टर ने कहा कि आपने किस लैब में जांच कराई है। इस बात को लेकर अभिनंदन जैन घोटाले की बात कहकर कार्रवाई की मांग करने लगे और यहां से बहस शुरू हुई। इसी दौरान कलेक्टर का सुरक्षा गार्ड आया और हाथ पकड़कर अभिनंदन जैन को बलपूर्वक बाहर करने लगा। इस पर अभिनंदन जैन ने कहा कि ‘मैं बंदूक या बम लेकर थोड़ी न आया हूं, जो इस तरह पकड़कर खींच रहे हो। उसके बाद एक और कर्मचारी आया, अभिनंदन जैन को गेट के बाहर निकाल दिया गया। मामला शांत होगया ।
उसके बाद कलेक्ट्रेट के चपरासी रामेश्वर सैमिल पुत्र पातीराम सैमिल उम्र 40 साल ने इस मामले की शिकायत सिटी कोतवाली में की। जहां चपरासी ने बताया कि जनसुनवाई कार्यक्रम में अभिनंदन जैन आए और स्वयं की कोई समस्या का कोई आवेदन न देते हुए पालक संघ के लेटरपैड पर गणवेश वितरण संबंधी आवेदन मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत को दिया। उसके उपरांत अकारण ही वह तेज आवाज में चिल्लाते हुए जनसुनवाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य में व्यवधान उत्पन्न कर शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाई। पुलिस ने चपरासी की शिकायत पर सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
चपरासी द्वारा करवाई गई एफआईआर की वैधानिकता और अधिकारिता पर सवाल !
अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं। लोग सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन को धक्के देकर निकालने तक की कार्रवाई को उचित मान रहे हैं परंतु घोटाला बताने वाले के खिलाफ एफआईआर को अनुचित बता रहे हैं। लोगों का कहना है कि सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन की शिकायत पर कार्रवाई होनी चाहिए, वो शासन की मदद कर रहा है। इधर एक प्रश्न और उपस्थित होता है कि क्या एक कार्यालय का चपरासी इस तरह के प्रकरण में फरियादी हो सकता है। क्या वो सक्षम प्राधिकृत अधिकारी है कि इस तरह की एफआईआर दर्ज कराए। सामान्यत: ऐसे मामलों में उपस्थित वरिष्ठ अधिकारी अपने पदनाम व सील के साथ मामले दर्ज कराते हैं। क्योंकि यह शासकीय कार्य में बाधा का मामला है जो निजी नहीं होता?
कलेक्टर के निर्देश के बिना चपरासी द्वारा एफआईआर होना मुमकिन नही ?
पुलिस द्वारा बिना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत चपरासी के आवेदन के आधार पर सीधी एफआईआर करना न्यायसंगत था ?
सामाजिक कार्यकर्ता अभिनंदन जैन का पक्ष सूने बिना पुलिस द्वारा कलेक्टर के दबाव में सीधे एफआईआर करना विधि विरुध्द है या नही ?
कुल मिलाकर इस घटना से यह प्रतीत होता है कि सामाजिक कार्यकर्ता को फंसाकर भ्रष्टाचार उजागर होने और जाँच से बचने का प्रपंच है यह मामला । ख़ैर प्रदेश के मुखिया कमलनाथ का ध्यानाकर्षण ज़रूरी है , क्यूंकि अब प्रदेश में मामा की सरकार नही है ।
भोपाल से सैयद ख़ालिद कैस की रिपोर्ट
