इन्दौर -बड़वाली चौकी पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारी औरतों बच्चों और बुजुर्गों पर रात को 3.30 बजे लाठीचार्ज करना पुलिस की उकसाने वाली कार्यवाही कियूं न मानी जाए ???
मस्जिद के गेट पर बैठे लोग हाथों में तिरंगा लेकर शांति पूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं और जिस जगह वो बैठे हैं वहां से कोई यातायात भी बाधित नहीं हो रहा है फिर आखिर उन्हें उठाने के लिए शासन-प्रशासन हठधर्मिता कियूं दिखा रहा है ??
भारत के संविधान के मुताबिक किसी नीति का लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक हक है जिसे हाल ही में नागरिकता कानून के विरोध में गिरफ्तार चंद्रशेखर की जमानत पर अपना फैसला देते हुए कोर्ट ने भी कहा है कि विरोध प्रदर्शन से किसीको रोका नहीं जा सकता तो क्या यह समझा जाये कि सरकार में बैठे लोगों की तानाशाही पूर्ण हठधर्मिता न्यायलय और संविधान से भी बडी हो गयी है…??
वर्दी या शासन प्रशासन में बैठे लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वो संविधान के प्रति जवाबदेह हैं न कि असंवैधानिक फैसले लेने वाले हठधर्मी नेताओं के…??
जब पुलिस प्रशासन खुद अपनी विज्ञप्ति में बता रहा है कि-“इंदौर की जामा मस्जिद पर एनआरसी के विरोध में धरना जारी है। अल सुबह से लोगो ने नमाज के बाद सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान गीत गाया। और हिंदुस्तान जिन्दा बाद के नारे लगाए। वही माहौल और अफवाहों के चलते पुलिस ने चेतावनी जारी है।
सभी नागरिक ध्यान दें जामा मस्जिद कुंवर मंडली में एनआरसी के विरोध में धरना शांतिपूर्वक जारी है। आप किसी भी तरह के अफवाह पर ध्यान ना दें। जामा मस्जिद कुंवर मंडली में वरिष्ठ प्रशासनिक व पुलिस के अधिकारी उपस्थित है। प्रशासन द्वारा सख्त चेतावनी दी गई है कि अफवाह फैलाने वालों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।”
इस विज्ञप्ति के अलावा भी सोश्यल मीडिया पर ऐसी हज़ारों पोस्ट मौजूद हैं जहां प्रदर्शनकारी मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को अपने साथ बैठा कर खाना खिला रहे हैं उनकी ज़रूरतों का ख्याल रख रहे हैं तो फिर आखिर पुलिस ने लाठीचार्ज जैसा असंवैधानिक/गैरजरूरी/अमानवीय और उकसाने वाला कदम कियूं उठाया ???
यह सवाल उन तमाम लोगो को सरकार से पूछना चाहिए जो सरकार की हिमायत करते हैं और उन विपक्षियों को भी उस कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहिए जो भाजपा सरकारों पर मुस्लिम प्रताड़ना के आरोप लगाती रही है….लेकिन सवाल उठाए कौन और कियूं ??? कियूंकि सियासी दलों की नीतियों अब विचारधारा पर नहीं अपने राजनैतिक नफे नुकसान के हिसाब से तय की जाती हैं…लेकिन प्रत्येक देशवासी को यह सोचना चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक देश मे अगर सरकार की नीतियों के लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार ही अगर इस तरह दमनपूर्वक छीन लिया जाएगा या दबा दिया जाएगा तो क्या लोकतंत्र ज़िंदा रहेगा ???
(परवेज़ इक़बाल)
