संजय सक्सेना
भोपाल । दो राज्यों के चुनाव और कई राज्यों में हुए उपचुनावों ने कांग्रेस को थोड़ी राहत का अनुभव कराया है, वहीं भाजपा को हलका झटका दिया है। परंतु मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने उपचुनाव के बाद अंतत: स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा छू ही लिया। निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े प्रदीप जायसवाल मंत्री हैं और उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। इस हिसाब से कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या 116 हो गई। इसने कांग्रेस को संजीवनी दे दी है, जबकि भाजपा को झटका लगा है। भाजपा में तो प्रदेश अध्यक्ष को ही बदलने की मांग उठने लगी है।
कहने को प्रदेश में भाजपा पंद्रह साल लगातार सत्ता में रही, लेकिन उसका संगठन लगातार कमजोर होता दिखाई दिया। दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कमान छोडऩे की इच्छा व्यक्त करने के बाद भी कांग्रेस नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं कर पाई है। फिर भी प्रदेश में एक विधानसभा क्षेत्र के उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने जीत दर्ज करने में सफलता हासिल कर ली है। कांग्रेस प्रत्याशी की इस जीत के साथ ही प्रदेश में कांग्रेस सरकार की स्थिति मजबूत हो गई है। झाबुआ सीट के कांग्रेस के खाते में जाते ही विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या 115 हो जाएगी, जो 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत 116 के आंकड़े से सिर्फ एक कम है, लेकिन निर्दलीय चुनाव लड़े प्रदीप जायसवाल कांग्रेसी ही हो चुके हैं, क्योंकि वह पहली बार में ही मंत्री बना दिए गए। इसके बाद से कुछ निर्दलीय विधायक समय-समय पर कांग्रेस सरकार को आंखे दिखाते रहे। इसमें दमोह जिले के पथरिया विधानसभा क्षेत्र से बसपा विधायक रामबाई और बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक शेरा आए दिन सरकार को आंखे दिखाने से नहीं चूक रहे थे। विधायक रामबाई के पति पर दमोह के कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या का आरोप लगने के बाद उनके तेवर ठंडे पड़ गए थे। कांग्रेस नेता की हत्या के बाद रामबाई करीब चार महीने तक गायब सी रहीं। इस बीच प्रदेश सरकार ने हत्याकांड की नए सिरे से जांच के आदेश दे दिए। थोड़े ही दिन बाद रामबाई के सुर बदल गए। बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक आए दिन सरकार पर मंत्री बनाए जाने का दबाव बनाए हुए थे। एक बार तो वे खुद को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाने तक का दावा ठोक चुके हैं , लेकिन कांग्रेस को अब राहत मिल चुकी है। ये निर्दलीय विधायक शेरा झाबुआ की जीत के बाद खुशियां मनाते देखे गए।
झाबुआ विधानसभा उपचुनाव के नतीजों से कांग्रेस खेमे में खुशी की लहर है। झाबुआ विधानसभा सीट कांग्रेस के कब्जे वाली मानी जाती है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भाजपा के गुमान सिंह डामोर ने हराया था। इस चुनाव में जेवियर मेड़ा ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था, जो कांग्रेस की हार का मुख्य कारण बना। पिछले चुनाव के नतीजों के अनुसार भाजपा के गुमान सिंह डामौर को 66558 मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के विक्रांत भूरिया को 56161 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े जेबियर मेड़ा को 20140 वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने भाजपा उम्मीदवार से बढ़त हासिल की थी, लेकिन वह लोकसभा चुनाव हार गए।
सांसद डामोर के त्यागपत्र के बाद झाबुआ में विधानसभा का पहली बार उपचुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने भाजपा के भानू भूरिया को 27804 मतों से हरा दिया। भूरिया केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं और प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इस बड़ी जीत ने जहां कांग्रेसियों को दीपावली से पहले जश्न मनाने का मौका दे दिया है। इस चुनाव से जहां कमलनाथ सरकार के 10 महीने के कामों का आकलन होना था, वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव विस चुनाव में मिली हार से आगे बढऩे का एक रास्ता था। अब कांग्रेस दावा कर रही है कि कांतिलाल भूरिया की जीत कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों की जीत है। इसके साथ ही यह तय हो गया है कि जनता कमलनाथ सरकार के कामों से खुश है और वह सरकार के साथ खड़ी है। भाजपा ने इस चुनाव में किसान कर्जमाफी, बिजली बिल के साथ ही पाकिस्तान तक का जिक्र किया था, परंतु चुनाव में कमलनाथ सरकार की कार्यप्रणाली के साथ ही स्थानीय समीकरण भी प्रभावी रहे। कांतिलाल भूरिया का उस क्षेत्र में खास प्रभाव है, लेकिन पूर्व विधायक जेवियर मेढ़ा की नाराजगी कहीं न कहीं उन पर भारी पड़ी। इसे मुख्यमंत्री कमलनाथ ने गंभीरता से लिया और मेढ़ा को बेलेंस कर लिया। यही नहीं, चुनाव के दौरान भूरिया को किसी ने मंत्री तो किसी ने उप मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया तो किसी ने आगामी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में प्रचारित किया। जो भी रहा, अब कांग्रेस बहुमत का आंकड़ा पा चुकी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्यशैली की शुरुआती दौर में भले ही आलोचना हो रही थी, अब कहीं न कहीं विश्वास की लहर आती दिख रही है। अभी नगरीय निकाय चुनाव भी सामने हैं, इसमें सरकार की कार्यप्रणाली को जनता एक बार फिर आंकेगी। अभी तक तो शहरी क्षेत्रों में भाजपा का पलड़ा भारी ही रहा है, एक भी नगर निगम कांग्रेस के कब्जे में नहीं थी, इस बार देखना होगा कि कांग्रेस का शहरी इलाकों में प्रभाव बढ़ता है या नहीं।
