मप्र विधानसभा चुनाव पर ताज़ा विश्लेषण
आइये दोस्तों इस रोचक चुनाव पर विचार विमर्श करते हैं,जरूरी नही कि आप किस दल की विचारधारा से संबंध रखते हैं।ऐसा चुनाव मप्र में कभी नही हुआ,इसीलिए विचार व्यक्त करने के लिए एक जागरूक नागरिक एवं वोटर होने की वजह काफी है।
क्या हुआ ऐसा कि भाजपा जीतते जीतते हार गई।”कोई माई का लाल” और मोदी सरकार द्वारा (Atrocity act) अनुसूचित जाति जनजाति कानून में फेरबदल के बाद हुए जबरदस्त नुकसान के बाद कुछ दुरुस्ती रथ यात्रा और संबल योजना से हुई।शानदार चुनावी योजना एवं संचालन के बावजूद भाजपा की हार एक बहुत बड़े आत्म विश्लेषण का विषय है केंद्रीय भाजपा नेतृत्व के लिए। केवल नाम ही काफी नही है बल्कि जमीनी हकीकत से दो चार होना भी जरूरी है।शिवराज का कुछ ही अधिकारियों पर अति विश्वास ,बल्कि सेवामुक्त अधिकारियों को उपकृत करने हेतु मुख्यमंत्री कार्यालय में नियुक्ति और शासन के निर्णयों में सभी मंत्रियों से दूरी ने शासन संचालन का केन्द्रीयकरण कर दिया था। व्यापम जैसे कांड के बाद भी मख्यमंत्री का चेहरा नही बदलना भी भाजपा को महँगा पड़ा।एक ही चेहरा देख देख लगता था भाजपा के पास भी कोई अन्य नेतृत्व नही है या फिर कांग्रेस की तरह परिवारवाद को आत्मसात कर लिया है भाजपा ने।
भरष्टाचार पर लगाम का वादा 2003 के चुनाव का मुख्य मुद्दा था किसे पलट कर भी भाजपा ने नही देखा।यहां तक कि भाजपा संगठन में कोई भ्रष्टाचार विरोधी इकाई नही बनी।और यह शिष्टाचार कई गुना बढ़ता गया।अधिकारियों पर पूर्ण निर्भरता ने इस रिश्वत की बेल को लगातार पोषित किया।
एक उच्च पद से रिटायर्ड अधिकारी ने कहा कि “मुझे नही समझ नही आता कि शासन का एक हाथ ईमानदार और एक बेईमान हो और प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व को पता न हो,आश्चर्य होता है।”
घोषणा दर घोषणा और क्रियान्वयन के नाम पर लीपा पोती व जमीनी असलियत से कोसों दूर रही भाजपा।अधिकारी और मंत्रियों की किसानों से ,गांव से दूरी भी बनी वजह।2003 के पहले का कार्यकर्ता दूर हुआ और सभी वरिष्ठ नेताओं का हाल क्या हुआ है ,ये किसी से छिपा नही है।
टिकिटों का गलत वितरण भी 20-22 सीटों की हार की वजह बना।दूसरी सूची में हुआ फेरबदल हार का बड़ा कारण बना।टिकटों के निर्णय में सभी मंत्रियों से विचार विमर्श न कर नेतृत्व ने बहुत बड़ी गलती की।कुछ नेता और संगठन के पदाधिकारियों ने निर्णय ले लिया एवं जमीन से जुड़े नेताओं और मंत्रियों को निर्णय से दूर रखा।बंगलौं के द्वार बंद रखने वाले मंत्री और पूरी तरह स्टाफ पर निर्भर मंत्री ,सभी हारे।आखिर में भाजपा की कब्र में कील ठोंकने का काम किया ,केंद्रीय नेतृत्व के द्वारा शीर्ष न्यायालय के निर्णय के खिलाफ कानून में बदलाव ने। आग लग गयी देश के सभी सवर्ण वर्गों के आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा में।
हां, मोदी की नोटबन्दी,जटिल GST प्रक्रिया , कश्मीर पर कोई निर्णय नही और मंदिर निर्माण पर मूक बने रहना बहुत महंगा पड़ा भाजपा को।15 वर्षों तक एक ही मुख्यमंत्रि का बने रहना एक बड़ा कारण बना इस हार का।
अब बात करतें है कांग्रेस की,यदि कांग्रेस पूरे 5 साल मप्र में सक्रिय रहती तो शायद त्रिशंकु होती विधानसभा नही आती,छत्तीसगढ़ की तरह जबरदस्त बहुमत मिलता।केवल विधानसभा सत्र के समय सक्रिय विपक्ष की मूक भूमिका भी इस स्थिति की जिम्मेदार है।सड़कों पर तो काँग्रेस आखिरी एक वर्ष में ही उतरी जबकि छत्तीसगढ़ में विपक्ष हमेशा सक्रिय रहा और मीडिया एवं जनता के सामने जमा रहा।दो अन्य दलों के निर्णायक समर्थन के साथ सरकार बनाकर हमेशा खतरे में रहेगी कांग्रेस, वो भी बसपा और सपा ?अपने कई बड़े नेताओं की बलि देकर अल्प बहूमत से आई कांग्रेस सरकार सुरक्षित तो नही कही जा सकती। हाँ, यह चुनाव जनता के मत की ताकत को जरूर दर्शाता है जिसने सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को आईना दिखा दिया।जीता वही जो जनता के बीच था ,अभिमान से दूर था और निजी सेवा की छवि बनाये हुए था।खैर, आगे की राह आसान नही है काँग्रेस के लिए, 2 लाख करोड़ से ऊपर के सरकारी कर्ज के बोझ से दबी नई सरकार के सामने जबरदस्त विपक्ष की भूमिका में भाजपा भूत बनकर नाचेगी।
15 वर्ष की विरोधी लहर (Anti incumbency) के बाबजूद, अपने बुते पर यहां तक 110 सीटें लाने वाला शिवराज ही है ,इस बात में कोई अतिशयोक्ति नही है। वाकई में छत्तीसगढ़ और राजस्थान से बहुत अच्छा प्रदर्शन शिवराज का रहा।
इसीलिये मैं कहता हूं कि “कांग्रेस नही जीती है ,भाजपा हारी है”।
राजीव जैन(राज), सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार, सदस्य, बाल कल्याण समिति,भोपाल
