मध्यप्रदेश में बीजेपी के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव इस बार आसान नहीं रहेगा.कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अब ऐसी सीटों पर सियासी समीकरण बिगड़ने लगा है, जहां बीजेपी का बरसों से कब्ज़ा था. संघ के प्रभाव वाली एक ऐसी ही सीट खरगोन की भी है, जो इस बार ख़तरे में है. फिलहाल बीजेपी के सुभाष पटेल यहां सांसद हैं.
खरगोन लोकसभा सीट संघ के प्रभाव वाली है. पिछले 3 चुनाव में इस सीट पर बीजेपी को एक तरफा जीत मिली.लेकिन दो महीने पहले हुए विधान सभा चुनाव में इस सीट की तस्वीर बदल गयी. है.यहां किसानों की नाराजगी और एंटी इंकम्बेंसी की वजह से बीजेपी के खाते में संसदीय क्षेत्र में आने वाली आठ विधानसभा सीटों में बीजेपी को सिर्फ एक सीट मिली, जबकि उसकी घुर विरोधी पार्टी कांग्रेस के खाते में 6 सीट गयीं. एक सीट पर निर्दलीय जीता.चुनाव में बीजेपी को 3 सीटों का नुकसान हुआ.
2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के पास 4-4 सीटें थीं.लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी के सुभाष पटेल ने खरगोन सीट पर ढाई लाख से अधिक वोटों से जीत हासिल की थी.इस अब कांग्रेस की नज़र इस सीट पर है. उसने लोकसभा सीट जीतने के लिए इस क्षेत्र के 3 विधायकों को कैबिनेट मंत्री बनाया है. दूसरी तरफ इस इलाके से बीजेपी सांसद सुभाष पटेल की जनता पर पकड़ ढीली है. सांसद महोदय इलाके से संबंधित समस्या और सवाल भी संसद में नहीं उठा पाए. साढ़े 4 साल में संसद में 96 प्रश्न पहुंचे लेकिन सिर्फ 2 पूरक प्रश्न लगाए गए.
विकास के नज़रिए से भी खरगोन संसदीय क्षेत्र पिछड़ा हुआ है. औद्योगिकीकरण भी नहीं हो पाया है. नौकरी और काम धंधा ना होने के कारण यहां से लोग बड़ी संख्या में खरगोन, बड़वानी से गुजरात और महाराष्ट्र के लिए पलायन कर गए हैं. कांग्रेस इस बार फसल बीमा योजना में गड़बड़ी और ऋण माफी को चुनावी मुद्दा बनाएगी.
विधानसभा चुनाव में बड़ी बढ़त के बाद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने की तैयारी कर रही है. यही वजह है कि इस इलाके से तीन मंत्री बनाए गए हैं.
कांग्रेस 2004 के चुनाव से ही इस सीट पर अपनी जमीन खो रही थी.आदिवासियों की दूरी से हर बार हार का अंतर बढ़ता रहा है.लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में वो किसानों के साथ आदिवासियों को भी साधने में कामयाब रही.विधानसभा चुनाव में उसने सांसद की निष्क्रियता को मुद्दा बनाया था.
