भोपाल. पौराणिक काल में दो मामा प्रसिद्ध हुए हैं, कंस और शकुनि, और आज के युग में भी एक मामा मध्यप्रदेश में हैं। पौराणिक काल के मामाओं की कथा सबको पता है, मध्यप्रदेश के के मामा की हम सुनाते हैं।
मध्यप्रदेश की पहचान पहले देश की कला, संस्कृति और संस्कार की राजधानी के रूप में हुआ करती थी।आज हालात यह हैं कि सत्ता की सरपरस्ती में निरंकुश अपराधी मप्र में राज कर रहे हैं । मप्र लगातार 2004 से अपराधों में अव्वल दर्जे में दर्ज़ किया जा रहा है । महिलाओं से दुष्कर्म में हाल यह है कि अब तक 2004 से 2016 तक 46308 बलात्कार हुए हैं,जो देश मे सर्वाधिक हैं। जहाँ 2004 में 2875 बलात्कार की नृशंस घटनाएं हुईं, वे आज बढ़कर 4909 प्रतिवर्ष होने लगे हैं ।
बच्चियों, महिलाओं के अपहरण के हालात यह हैं कि जहाँ 2004 में 584 अपहरण होते थे, वे आज 4904 अपहरण प्रति वर्ष पर पहुँच गए हैं । अर्थात लगभग 10 गुना बढ़ गए ।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देश में सबसे ज्यादा 42.8% बच्चे कुपोषण का शिकार मप्र में हैं,अर्थात 4708000 बच्चे , मोदी सरकार की SRS – 2017 की रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में नवजात शिशु मृत्यु दर 32 है, जो कि देश में सबसे ज़्यादा है।इस मान से मध्यप्रदेश में 61 हज़ार बच्चों की जन्म के पहले 28 दिनों में ही मृत्यु हो जाती है। इसी तरह शिशु मृत्यु दर भी देश में सबसे ज़्यादा 47 है।यानी लगभग 90 हज़ार बच्चे अपना पहला जन्म दिन भी नहीं मना पाते हैं ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की हाल ही में आई रिपोर्ट यह बताती है कि भारत में सबसे ज़्यादा बच्चे मध्यप्रदेश में गायब होते हैं।एक वर्ष में मध्यप्रदेश में 8503 बच्चे गायब हुए , इसमें से 6037 लड़कियाँ और 2466 लड़के हैं।
मामा जी ने मध्यप्रदेश का यह हाल किया है कि केंद्रीय मानवसंसाधन मंत्रालय की हाल ही में भारत में स्कूली शिक्षा की रिपोर्ट बताती है कि मप्र में 150762 स्कूलों में से मात्र 28.60 % स्कूलों में बिजली है और मात्र 14.58% स्कूलों में कंप्यूटर की शिक्षा दी जाती है और यह आंकड़ा पूरे देश मे सबसे बदतर है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मप्र के सामाजिक सरोकारों को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा कर मामा सत्ता के मजे लूट रहे हैं।
2. किसान के खून से रंग सरकार के हाथ :
क्या कभी आपने सुना है कि कोई भक्त अपनी सरपरस्ती में अपने भगवान को मौत के घाट उतारता हो ? किसानों को भाषणों में भगवान बताते हैं और आतंकियों की तरह अन्नदाता किसानों के सीने में गोलियाँ चलवाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मप्र में भाजपा सरकार में अब तक 15283 किसानों ने आत्महत्या की है । क्योंकि उसे फसलों के दाम नही मिलते और जब किसान अपनी पीड़ा लेकर सरकार के पास जाता है तो उसके सीने में गोलियाँ उतार दी जाती हैं । पहले भी 2012 में रायसेन में जब किसानों का आंदोलन हुआ था तब किसानों गोलियाँ चलवाईं और किसानों को मौत के घाट उतार दिया था ।खुद राज्य मानव अधिकार आयोग ने ये बात स्वीकार की थी ।
अब भी मंदसौर में 6 जून 2017 को भी 6 किसानों को भाजपा की हत्यारी सरकार ने मौत के घाट उतार दिया।और हद तो यह है कि भाजपा सरकार हत्यारों को सज़ा से बचाने के लिए जाँच आयोग को कहती है कि पीड़ित किसान आयोग के सामने जिरह नहीं कर सकते । शर्मनाक बात है ।
3. कृषि पंप का 50,000 करोड़ से अधिक का सब्सिडी घोटाला :
मध्यप्रदेश में सिंचाई के लिए प्रयुक्त में आने वाले लगभग 27 लाख पंप बगैर मीटर के हैं, जिसमें पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के अधीन 9 लाख, मध्य क्षेत्र में 6 लाख और पश्चिम में 12 लाख। शिवराज सरकार ने यह बताया है कि 1400 रु प्रति HP सालाना वे फ़्लैट रेट से किसानों से पैसा लेते हैं और किसान 30 दिनों तक 10 घंटे रोज़ 8 माह कृषि पंप चलाता है और 1790 यूनिट ख़र्च होती है, और सरकार 4 रु 70 पैसे की दर से 5 HP का बताती है कि 42065 रु का बिल आता है तथा किसान से 1400 रु प्रति HP सालाना के हिसाब से 5 HP के 7000 रु. लिए जाते हैं और बाकी 35065 रु की सब्सिडी बताई जा रही है । और इस प्रकार इस वर्ष 9000 करोड़ रु का कृषि पंप की सब्सिडी का प्रावधान किया गया है । और यह घोटाला बीते लगभग 10 वर्षों से चल रहा है । पूरे प्रदेश क्या, पूरे देश मे ऐसी कोई खेती नहीं जिसमें लगातार 10 घंटे 8 माह तक रोज़ पानी दिया जाता हो। इसीलिए इन कृषि पम्पों के मीटर निकाल दिए गए हैं और किसानों के नाम पर यह सब्सिडी की लूट जारी है ।
4. कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना :
मप्र के सीहोर में देश के प्रधानमंत्री और मप्र के मुख्यमंत्री जी ने PM फसल बीमा योजना का उद्घाटन करते हुए कहा था कि विश्व की सबसे अच्छी फसल बीमा योजना हम देश के किसानों को दे रहे हैं। मगर असलियत यह है कि मामा और मोदी सरकार इस योजना को किसानों की अपेक्षा प्राइवेट कंपनियों के लिए लेकर आए हैं ।
सच्चाई यह है कि किसानों की फसलों का बीमा करने का काम दस से अधिक निजी और सरकारी कंपनियों को मोदी जी ने सौंपा है। पहला बीमा खरीफ़ 2017 के लिये किया गया था और फिर रबी 2016-17 के लिये। जिसके परिणाम सामने आए हैं, जो बताते हैं कि देश के किसानों ने प्रीमियम के रूप में 3775 करोड़ रु, केंद्र ने अपने हिस्से के 50% (8178 करोड़ रु), राज्य ने 50% (8525 करोड़ रु) दिए, जिसमें से किसानों को बीमा राशि 5650 करोड़ मिली और निजी कंपनियों के खातों में मुनाफा 14828 करोड़ रु हुआ।
वहीं मध्यप्रदेश के परिप्रेक्ष्य में खरीफ़ 2016 के जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार किसानों का प्रीमियम 402 करोड़ रु, राज्य का हिस्सा 1216.78 करोड़ रु, केंद्र का 1216.78 करोड़ रु ,किसानों को मुआवज़ा 636 करोड़ और कंपनियों का मुनाफ़ा 2199 करोड़ रुपए है। अर्थात किसानों के नाम पर प्राइवेट कंपनियों की लूट है यह योजना ।
5. प्रदेश के आदिवासी भाई – दरबदर :
देश के 10 करोड़ आदिवासी भाइयों को अधिकार संपन्न बनाते हुए कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ‘वनाधिकार अधिनियम’ लेकर आई थी, जिसके तहत न सिर्फ़ आदिवासी भाइयों के वन में रहने का अधिकार सुनिश्चित किया गया था,अपितु उनकी आजीविका भी। आज देश की सबसे बड़ी आदिवासी भाइयों की आबादी, लगभग 1 करोड़ 53 लाख, मप्र में है, और सबसे ज़्यादा उनके हक़ और अधिकारों पर कुठाराघात मध्यप्रदेश में हो रहा है ।
मप्र के आदिवासी परिवारों ने 615467 पट्टों के आवेदन शिवराज सरकार को दिए थे, जिसमें ग्रामसभा की अनुसंशा भी शामिल थी। मगर भाजपा सरकार ने 364166 पट्टे निरस्त कर दिए। मप्र और छत्तीसगढ़ ,दोनों राज्यों ने सर्वाधिक पट्टे निरस्त किये हैं, और इन दोनों राज्यों में लगभग 40 लाख आदिवासी भाइयों के सामने रहने और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
देश का दिल कहा जाने वाला मप्र आज द्रवित और दर्द से भरा हुआ है; अपराधियों के आतंक से, शिक्षा माफ़ियाओं के संगठित गिरोह से और भाजपाई भ्रष्टाचार से। अब समय आ गया है, इस अंधकार को दूर कर एक नई लौ जलाने का और मप्र में एक नया सवेरा लाने का
