शिक्षाविद अनिल सदगोपाल की प्रतिक्रिया
अनिल सदगोपाल देश के जाने माने शिक्षाविदों में से एक है. वे शिक्षा से जुड़ी कई समितियों में शामिल भी रहे हैं. फ़िलहाल अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच से जुड़े हैं और भोपाल में रहते हैं.
नई शिक्षा नीति को वो आरएसएस से स्वीकृति लेने के बाद जारी किया गया ड्राफ्ट बताते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि इस शिक्षा नीति को मूलत: तीन बिंदुओं से देखने की ज़रूरत है. पहला- इससे शिक्षा में कॉरपोरेटाइजेशन को बढ़ावा मिलेगा, दूसरा इससे उच्च शिक्षा के संस्थानों में अलग-अलग ‘जातियाँ’ बन जाएँगी, और तीसरा ख़तरा है अति-केंद्रीकरण का.
अनिल सदगोपाल अपने इस विचार के पक्ष में तर्क भी देते हैं. उनके मुताबिक़ मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नीति आयोग ने स्कूलों के लिए परिणाम -आधारित अनुदान देने की नीति लागू करने की बात पहले ही कह दी है.
ऐसे में जो स्कूल अच्छे होगें, वो और अच्छे होते चले जाएँगे और ख़राब स्कूल और अधिक ख़राब. ये हम सब जानते हैं कि सरकारी स्कूल प्राइवेट के मुक़ाबले कहाँ हैं. तो इससे फ़ायदा प्राइवेट वालों को ही होगा. उनका मानना है कि इसी संदर्भ में नई शिक्षा नीति में स्कूल कॉम्प्लेक्स का प्रावधान किया गया है.
उनका आरोप है कि इस शिक्षा नीति में आरक्षण का ज़िक्र तक नहीं हैं.
वो आगे कहते हैं कि देश की 80 फ़ीसदी आबादी दलित, मुस्लिम, ओबीसी, आदिवासी और अति पिछड़ा वर्ग है. उनमें से ज़्यादातर छात्र जो कक्षा एक में दाख़िला लेते हैं वो 12वीं तक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते.
वोकेशनल कोर्स के नाम पर ग़रीब और निचले तबके के लोगों को मुख्यधारा से अलग करने की एक कोशिश है नई शिक्षा नीति. स्किल इंडिया मिशन के बहाने ऐसे लोगों को कम दिहाड़ी के दुकानों पर मज़दूरी करने के लिए धकेल दिया जाएगा. 12वीं अगर पास भी कर लेंगे तो डॉक्टर इंजीनियर नहीं बन पाएँगे.
उनका तीसरा आरोप है कि इंडियन एजुकेशन सर्विस, राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान, नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी ऑथोरिटी, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जैसी नई-नई संस्थाएँ बना कर केजी से पीजी तक सब कुछ केंद्र सरकार अपने हाथ में ले लेना चाहती हैं, जिसमें स्वयं सेवकों का भी अहम रोल होगा.
उनके मुताबिक़ चार साल का ग्रेजुएशन विदेशों मे प्रचलित प्रणाली है. इस पर देश में पहले भी विरोध हो चुका है इसे दोबारा लागू करने के पीछे मंशा स्पष्ट है.
( बीबीसी से गोपाल राठी से साभार )
