ओमप्रकाश गौड़, वरिष्ठ पत्रकार
एक अजीब सा सवाल है पत्रकार कौन? उससे ज्यादा टिपिकल सवाल है सही पत्रकार कौन? फर्जी कौन? और भी ज्यादा मजेदार सवाल है ईमानदार कौन बेईमान कौन? यह सवाल इसलिये खड़ा होता है कि पत्रकारिता करने के लिये एक खर्चे की जरूरत पड़ती है. वह कहां से आता है. पत्रकारों की एक श्रेणी पहले ही थी. वह थी श्रमजीवी पत्रकार. यानि जिसके जीवनयापन का माध्यम पत्रकारिता से जुड़ी आय रही हो. आजादी के समय भी सभी पत्रकारों की जीवनयापन के सारे खर्च पत्रकारिता से नहीं सधते थे इसलिये उस समय भी शौकिया से लेकर अंशकालीन पत्रकारिता का प्रचलन था. तब भी अंग्रेज उनका पक्ष लेने वाले पत्रकारों को अतिरिक्त सुविधाएं देते थे. जो आजादी की लड़ाई से जुड़े थे वे अंग्रजों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर फैंके गये टुकड़े ठुकरा देते थे. यही कारण है कि अंग्रज समर्थक पत्रकारों की मौज थी और आजादी समर्थक पत्रकारों के हिस्से मेें आती थी फांकामस्ती. ऐसा ही हाल कुछ पत्रकारितता से जुड़े संस्थानों का भी था. आजादी के बाद पत्रकारिता की ओर समाज और सरकार का ध्यान ज्यादा गया. तब आजद भारत की सरकार ने अंगे्रज सरकार की जगह ले ली. और आजादी समर्थक पत्रकारों की जीवनशैली ही संघर्ष की थी इसलिये सरकार समर्थकों के खेमें में ज्यादा नहीं गये. संस्थानों ने भी कमोबेश ऐसा ही किया. लेकिन समय के साथ संघर्ष का माद्दा कम हुआ और सरकार के पाले में जाने वाले पत्रकारों का कुनबा बढता गया. फिर आया श्रमजीवी का सवाल. तब संसद में पास कराया गया श्रमजीवी पत्रकार कानून जिसने पत्रकारों को परिभाषित किया. उसके बाद शुरू हुआ अभिमान्यता का खेल. अधिमान्यता की मूल धारण यही रही कि सरकार किसे अपनी जानकारी दे या सरकार से जानकारी लेने के लिये किसे प्रामाणिक माना जाए. तब इसके लिये नियम बनाए गये. अधिमान्य पत्रकारों का अखबार और संस्था के हिसाब से कोटा बना. श्रम कानूनों को लेकर हमेशा से ही भ्रष्टाचार रहा है जो आज भी चरम पर है. नतीजा यह रहा कि सरकार ने अधिमान्य पत्रकारों को ही पत्रकार माना और ज्यादातर अधिमान्य पत्रकारों ने इसका भरपूर दोहन भी किया. सरकार से कालांतर में जब अखबारों के संस्थानों को इस ताकत का अहसास हुआ तो उन्होंने इस कोटे पर अपनी कब्जा पूरी तरह से न सही अंशत: करना शुरू कर दिया. धीरे धीरे मध्यम व छोटे दर्जे के अखबारों में तो यह मालिकों के खातों में आ गया. मालिक स्वयं, फिर उसके भाई, परिवार के सदस्य और साले सालियां अधिमान्य पत्रकार बन गये. वेतनभोगियों की संख्या तुलनात्क तौर पर कम रही. आधे से ज्यादा तो वे ही रहे जिन्हें पत्रकारिता के लिहाज से अंगूठाछाप कह दो तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. आज तो अधिमान्यता इतने प्रकार की हो चली है कि गिनती भी लगाना जरा मुश्किल काम हो गया है. इसी बीच अखबारों को सरकारी मदद दी जाने लगीॅ. इसमें अधिमान्यता ने अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी. अखबारों और अधिमान्य पत्रकारों को मिलने वाली नियमानुसार और इत्तर मदद ने ही उस भ्रष्टाचार को जन्म दिया जिससे भ्रष्ट पत्रकार और फर्जी पत्रकार की श्रेणी जन्मी. इनमें अंतर इतना बारीक हे कि इसे पकडऩा काफी कठिन है. फिर दूसरी श्रेणी के पत्रकार इतने जमीनी हालात में व्यवहारिक तौर पर इतने ताकतवर हैं माफिया, सरकार और अदालतों से लडऩे वाले ज्यादातर पत्रकार भी इनसे लडऩे से कतराते हैं. कानून में इतने छेद हे कि यह लड़ाई आसान नहीं हे. इसी से पैदा हो रहा ही है पत्रकार सुरक्षा की बात और उससे जुड़े कानून की जरूरत. मैं उसका विरोध नहीं करता लेकिन अपनी बात भोपाल के जानेमाने पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र नूतन ने जो मुझसे कहा था उससे खत्म करता हूं. इससे पहले जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि आज भी भोपाल के क्राइम रिपोर्टिंग के श्रेष्ठतम पत्रकारों में स्वर्गीय राजेन्द्र नूतन का नाम सबसे उपर आता है. उन्होंने कहा कि यार हमारा तो कई बार उन गुंडों से सामना हो जाता था जिनके खिलाफ हमने अपने अखबार में खबर छापी होती थी. वे ही हमें बताते थे कि हमारी खबर में क्या क्या गलत था और क्या सच्चाई है. हम बाद में उस सच्चाई को भी छाप देते थे तो कभी फिर सामना हो जाए तो वे उस बारे में चर्चा तक कर लेते थे. कभी हम सही हालत में होते थे तो कभी गड़बड़ लेकिन उन्होंने कभी हमसे दुश्मनी नहीं की. क्योंकि वे भी कहते थे आप अपना काम कर रहे हो हम अपना. हमारी किसी से लड़ाई हो सकती है, पुलिसे से लुकाछिपी है पर आपसे कैसा झगड़ा.. आप तो निष्पक्ष हैं. पार्टी होते तब झगड़ा होता हम आपसे भी वही बर्ताव करते जो अपने दुश्मन से कर रहे हैं. तो जनाब यह थे स्वर्गीय राजेन्द्र नूतन उनकी विश्वश्नीयता और निष्पक्षता. आप विश्वसनीय हैं और निष्पक्ष है तो कैसी सुरक्षा. पर जमाना बदला है इसलिये कानून जरूरी है. इसलिये कानून की मांग का समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं.। साभार
