दिल्ली सरकार ने एक ऐसा सख्त फैसला लिया है, जो सारे देश के लिए मिसाल बन सकता है। निजी अस्पतालों ने अपने आचरण से लोगों के मन में अपने प्रति एक तरह का अविश्वास पैदा कर दिया है। इसलिए ये जनभावना व्यापक है कि उनकी जवाबदेही तय करने का कोई तरीका हो। राष्ट्रीय राजधानी के शालीमार बाग इलाके में स्थित मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिल्ली सरकार ने दिखाया है कि ऐसा करने के प्रावधान मौजूद हैं। जाहिर है, प्रशासन उन्हें लागू करने का साहस अक्सर नहीं दिखा पाता। नतीजतन, ज्यादातर निजी अस्पताल इलाज और सेवा का स्थल होने के बजाय मरीजों से पैसा ऐंठने की जगह बनते चले गए हैं। मैक्स अस्पताल की शालीमार बाग शाखा में हद हो गई, जब प्रीमेच्योर (समय से पूर्व) जन्मे जुड़वां शिशुओं को डॉक्टरों ने मृत बताकर शव उनके माता-पिता को सौंप दिए, जबकि एक शिशु जीवित था। इससे ज्यादा लापरवाही आखिर और क्या हो सकती है?
अस्पताल ने दो संबंधित डॉक्टरों को नौकरी से हटाकर सारी जिम्मेदारी उन पर थोपने की कोशिश की। जबकि इस घटना से असल में निजी अस्पतालों की संस्कृति कठघरे में पहुंची। वहां के हालात से परिचित लोग मानते हैं कि निजी अस्पतालों के डॉक्टरों पर मुनाफा कमाकर देने का आज इतना दबाव है कि वे हर मरीज को सिर्फ आमदनी का जरिया मानने लगते हैं। कुछ समय पूर्व हरियाणा के गुरुग्राम में एक अस्पताल ने डेंगू पीड़ित बालिका के इलाज (जिसकी मौत हो गई) के बदले 16 लाख रुपए का बिल थमा दिया था। जांच के लिए बनी सरकारी समिति ने अस्पताल के आचरण को दोषपूर्ण माना। तब हरियाणा सरकार ने कहा कि वह अस्पताल को दी गई जमीन की लीज रद्द करने की संभावनाओं का पता लगा रही है।
स्पष्टत: ऐसे सख्त कदमों की बेहद आवश्यकता है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था अधिकाधिक निजी क्षेत्र पर निर्भर होती गई है। अनुमानत: अपने देश में इलाज पर तीन चौथाई खर्च मरीजों को अपनी जेब से करना पड़ता है। यानी लोक स्वास्थ्य व्यवस्था का योगदान काफी सिकुड़ चुका है। ऐसे में जरूरी है कि न सिर्फ निजी अस्पतालों में मौजूद इंतजामों, बल्कि वहां के डॉक्टरों और प्रबंधन के व्यवहार की भी लगातार निगरानी की जाए। इस पर अब खुली बहस हो कि क्या इन अस्पतालों में मरीजों की अनावश्यक जांच कराई जाती है? क्या वहां गैर-जरूरी उपचार (खासकर सर्जरी) किया जाता है? क्या डॉक्टरों का नुस्खा दवा कंपनियों से उनकी मिलीभगत से प्रभावित होता है? एक राय है कि अत्यधिक बिल या इलाज में लापरवाही इन सबका ही परिणाम हैं। दिल्ली और गुरुग्राम की ताजा घटनाओं के बाद ऐसे संदेहों को हल्के से खारिज नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि ऐसी घटनाएं भले ही कभी-कभार होती हों, लेकिन आम लापरवाही या मरीजों के ठगे जाने की शिकायतें देशभर में अक्सर आती रहती हैं। अब इन पर विराम लगाने की जरूरत है। यह तभी संभव है, जब सरकारें कानून और नियम-कायदों को लागू करने व इसमें लापरवाही बरतने वाले पर सख्त कार्रवाई की दिशा में वैसी चुस्ती दिखाएं, जैसी फिलहाल दिल्ली सरकार ने दिखाई है।
