।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।
राजस्थान के जाट समुदाय का कांग्रैस राजनीति मे कमजोर होते वर्चस्व को लेकर खासतौर पर युवा जाट तबका मोजुद समय मे काफी सतर्क होने के साथ साथ अनेक तरह के तर्क देकर समझाने की कोशिश कर रहे है कि अब उनकी सियासत किधर जाने लगी है। जिसके कारण उनके नेतृत्व को कड़ी चुनौती मिलने लगी व मिलती साफ नजर आ रही है।
कांग्रैस मे कमजोर होता जाट नेतृत्व के चलते यूपी-दिल्ली व हरियाणा से आज जाट मुख्यमंत्री बनने के ख्वाब टूटने लगे है। गैर कांग्रैस दलो को पूरा स्पोर्ट करने के बावजूद हरियाणा मे पिछले समय जाट मुख्यमंत्री नही बन पाया, जबकि कांग्रैस की सत्ता के समय हरियाणा मे अक्सर जाट मुख्यमंत्री बनते रहे थे। इसी तरह राजस्थान मे भी कांग्रैस मे जाट समुदाय की मजबूती के बजाय कमजोर होते नेतृत्व के चलते जाट नेतृत्व को पंख नही लग पाये। जबकि जब जब कांग्रैस मे मजबूत जाट नेतृत्व था तब तब कम से कम जाट नेतृत्व की आवाज तो मजबूती से उठती रही है। युवाओं का राजस्थान के मोजूदा राजनीतिक व लोकसभा चुनाव पर यहां तक कहना है कि एक वर्ग है जो जाट राजनीति को कमजोर करना चाहते है लेकिन वो ऐसा होना नही देना चाहते है। उनका मानना है कि जहां जहा कांग्रैस जाट उम्मीदवार हारता है तो आगे चलकर उस जगह जाट नेता को टिकट मिलना मुश्किल होने लगता है। राजस्थान मे बीकानेर, श्रीगंगानगर व भरतपुर तो आरक्षित हो गई। बाडमेर से पीछले समय कांग्रैस की तरफ से जाट उम्मीदवार के लोकसभा हारने पर कांग्रैस ने वहा उम्मीदवार बदल दिया। चूरु सीट माइनोरिटी कोटे मे चली गई। अब बचे जाट उम्मीदवार नागोर, सीकर, पाली, जयपुर ग्रामीण व झूंझुनू के कांग्रैस उम्मीदवार हार जाते है तो अगली दफा यहां भी जाट की बजाय अन्य को टिकट देने की मांग जोर पकड़ सकती है।
कुल मिलाकर यह है कि जाट समुदाय मे अण्डर करंट चल रही एक खास बात कि वो कांग्रैस मे जाट सीटे बरकरार रखने के अलावा अगली दफा उम्मीदवार की तादात बढाने के खातिर कांग्रैस के जाट उम्मीदवारो को लोकसभा मे हर हाल मे भेजे। ताकि सीटे बरकरार रखने के अलावा बढत पर विचार हो। राजनीति का दस्तूर है कि हारने पर राजनीतिक दल अगले चुनाव मे उम्मीदवार बदलाव पर विचार जरुर करते है।
