।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।
राजस्थान के अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपनी तरफ पूख्ता आता मानकर कांग्रैस उम्मीदवारो व दिग्गज नेताओं ने अजीब चुनाव रणनीति बनाकर चल रहे है कि वो चुनाव प्रचार मे उन्हे किसी तरह का महत्व देने की बजाय उनसे एक दूरी बनाकर चलते नजर आ रहे है। जिससे अल्पसंख्यक मतदाताओं मे मतदान के प्रति जो विधानसभा चुनावों मे जौश था वो अब किसी भी स्तर पर नजर नही आ रहा है।
राजस्थान मे अल्पसंख्यक मतदाताओं मे करीब चोदाह प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के अलावा सिक्ख, बोद्द व ईशाई मतदाता भी चुनावी मुकाबले मे असरकारक नजर आता है। अल्पसंख्यक समुदाय के जैन मतदाताओं का रुझान भाजपा की तरफ अधिक माना जाता रहा है। लेकिन बाकी अल्पसंख्यक मतदाताओं का रुझान कांग्रैस की तरफ साफ नजर आ रहा है।
हालांकि राजनीतिक जानकारो द्वारा माना जा रहा है कि राजस्थान मे सभी लोकसभा सीटो पर दो दलो मे सीधा मुकाबला होने के कारण अधीकांश अल्पसंख्यक मतदाता कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष मे मतदान करेगा। लेकिन देखना होगा कि वो विधानसभा चुनाव की तरह नब्बे प्रतिशत तक मतदाता घर से निकलकर बूथ तक जाता है या फिर मोजूदा समय मे उदासीन नजर आने के चलते साठ प्रतिशत तक ही मतदान करेगा। विधानसभा चुनावों मे उम्मीदवारो व सामाजिक कार्यकर्ताओं की कोशिशों के कारण अल्पसंख्यको का मतदान प्रतिशत बडा था। लेकिन अब पार्टी स्तर पर व उम्मीदवार की सोच मे एक खास बदलाव देखा जा रहा है कि वो अल्पसंख्यक मतदाताओं को गारंटेड मतदाता मानकर उन पर कोई खास तवज्जो नही दे रहे है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलेट करीब करीब लोकसभा की सभी सीटो के कांग्रैस उम्मीदवारो के पर्चा दाखिल सभाओ मे जा चुके है। लेकिन उनके भाषणों व कांग्रैस घोषणा पत्र मे मुस्लिम शब्द से परहेज किया जा रहा है। जबकि जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार वैभव गहलोत के लिये राजस्थान के एक मात्र मुस्लिम मंत्री शाले मोहम्मद व राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन डा.निजाम अल्पसंख्यक बस्तियों व घर घर मत पाने की कोशिश जरूर करते नजर आ रहे है।
लोकसभा चुनाव मे अल्पसंख्यक मतदाताओं का रुझान पूरी तरह कांग्रैस की तरफ नजर आही नही रहा बल्कि मतदान केंद्र पर जितना मतदाता जायेगा मानो उतना ही कांग्रैस को ही वोट करेगा। अगर उनका मत प्रतिशत किन्हीं कारणो से बढ नही पाया तो मानो कांग्रैस को सीधा सीधा नुकसान होना है। इसलिये अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं मे छाई उदासीनता को दूर करके विधानसभा चुनावों की तरह उनके मत प्रतिशत को ऊंचा करने के उपायो पर कांग्रैस को सोचना चाहिए।
राजस्थान की सभी पच्चीस सीटो पर नामजदगी के पर्चे भरने का कार्यक्रम आज पुरा हो चुका है। तेराह लोकसभा क्षेत्रो मे उनतीस अप्रेल को व बारह पर छ मई को मतदान होकर तेईस मई को परिणाम आने है। तेराह क्षेत्रो मे चुनाव प्रचार धीरे धीरे जोर पकड़ने लगा है। बाकी बाराह पर तीन दिन बाद नाम वापसी के बाद चुनाव प्रचार जोर पकड़ने लगेगा।जबकि सीकर से घोषित कांग्रैस उम्मीदवार सुभाष महरिया सहित कुछ उम्मीदवारो ने तो नाम घोषित होने के बाद से चुनाव प्रचार शूरु करके सामने वाले उम्मीदवारों पर बढत बना रखी है।
राजस्थान के 2018 के विधानसभा चुनाव मे कांग्रैस-भाजपा को मिले मतो मे एक प्रतिशत से भी कम अंतर होने के बावजूद कांग्रैस ने सीटे अधिक झटकने के कारण सरकार बनाई है। कांग्रैस ने विधानसभा चुनावो मे 39.03 मत प्रतिशत पाकर 99 सीट जीती थी। इसी तरह भाजपा ने 38.8 मत प्रतिशत मत पाकर 73 सीट जीती है। इन दोनो के मुकाबले अन्यो ने 22 प्रतिशत मत पाकर 27 सीटे जीती थी। एक प्रतिशत के अंतर आने से भाजपा के मुकाबले कांग्रैस ने 26 सीटे अधिक जीती है। तो अब लोकसभा मे मत प्रतिशत का अंतर काफी बदलाव ला सकता है। दूसी तरफ अन्यो को मिले 22 प्रतिशत मतो मे से भाजपा व कांग्रैस उम्मीदवार कितने अपने अपने खाते मे ला सकते है, उस मत प्रतिशत का असर भी लोकसभा चुनाव परिणाम पर निश्चित पड़ना है। तेराह मे से बारह निर्दलीय विधायकों के कांग्रैस को समर्थन देने के अलावा अनेक निर्दलीय उम्मीदवारो ने कांग्रैस जोइन कर ली है। फिर भी बसपा, माकपा, बीटीपी व रालोपा का कांग्रैस से किसी तरह का गठबंधन नही है।
कुल मिलाकर यह है कि कांग्रैस को बाजी मारने के लिये अपने अन्य मतदाताओं की तरह अलपसंख्यक मतदाताओ मे भी जौश व सक्रियता का भाव भरकर अधिकाधिक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक जाकर मतदान करने के उपायो पर विचार करके किसी कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए। अन्यथा सो मे नब्बे के मुकाबले सो मे साठ वाला मतदान पर सब्र करना होगा।
