भोपाल । पिछ्ले 15साल से प्रदेश मेँ भाजपा सरकार रही । सूचना अधिकार अधिनियम 2005के आस्तिव मेँ आने के बाद से ही सरकार ने एक सोचे समझे प्लान के तहत आरटीआई क़ानून को कमज़ोर करने का कुचक्र रचा । जिसका परिणाम यह हुआ कि शासन प्रशासन के अधिकारी कर्मचारियों के मध्य विसंगतियां परम्परा का रूप धारण कर गई कि भ्रष्टाचार को जितना हो सके छिपाए रखा जाए या यह कहें कि आज क़ानून को बनें 14 वर्ष गुजरने को हैँ और प्रशासनिक अमले को क़ानून का ज्ञान नही । ऐसा ही एक मामला सागर कमिश्नर ऑफिस से जारी पत्र के माध्यम उजागर हुआ । जिसने यह साबित कर दिया कि प्रशासनिक अमला कितना निकम्मा है जो अधिनियम के साथ जमकर खिलवाड़ करता रहा है और कर रहा है ।
क्या है मामला –
महाराजपुर छतरपुर निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट कौंसिल के राष्ट्रीय महामंत्री खेमराज चौरसिया ने 18/06/2019 को अधिनियम की धारा 6(1)के तहत एक आवेदन लोक सूचना अधिकारी सागर कमिश्नर कार्यालय सागर मेँ प्रस्तुत कर जानकारी चाही । जिसपर सागर कमिश्नर कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी द्वारा अपने लिखित पत्र के माध्यम से यह लिखकर निरस्त कर दिया कि आवेदक द्वारा रूपए 10/-का जो पोस्टल ऑर्डर लगाया था उसके स्थान पर नान ज्यूडिशियल स्टाम्प लगाया जाए और चाही गई जानकारी हमारी समझ के परे इसलिए पुनः स्टाम्प के साथ आवेदन प्रस्तूत किया जाए ।
सागर कमिश्नर ऑफिस द्वारा जारी यह पत्र और उसमे दिए उल्लेख से यह स्पष्ट होता है कि जानबूझकर जानकारी छिपाया जा रहा । यह भी ज्ञात हुआ कि इस ऑफिस से सभी आरटीआई आवेदनो पर ऐसी ही आपत्तियां लगाकर निरस्त किये जाने की परम्परा वर्षो पुरानी है ।
@सैयद ख़ालिद कैस की क़लम से
