एक छात्र अपने गुरु ( प्रिंसिपल ) के सीने में पांच गोलियां उतार देता है । प्रिंसिपल मौके पर दम तोड़ देती है, कत्ल हो जाता है एक ऐसा रिश्ता जिस को हमारे शस्त्र माता पिता से भी बढ़ कर बताते हैं | दरअसल ये कत्ल एक प्रिंसिपल का नही हम भारत वासियों की नैतिकता का हुआ है ।
बढ़ते आधुनिक युग में आज स्कूल में बड़े बड़े खेल मैदान आसमान छूने वाली इमारतें दे दी हो लेकिन इस युग ने हमारे मासूमों से वो किताब छिन ली जिस को नैतिक शिक्षा की छोटी सी किताब कहते थे । जिस में गुरु को भगवान से ऊपर बताया जाता था । जिस की वजह से उस समय छात्र गुरू की आंखों से डरते नही सम्मान करते थे । आज के समय एक टीचर अपने छात्र का कान भी पकड़े ले तो हम उस को जेल की हवा खिला देते है । स्कूल में कोई छोटी घटना हो या बड़ी उस के लिए प्रिंसिपल को जेल की काल कोठरी देखना पड़ती है । हर एक घटना के लिए स्कूल के टीचर या प्रिंसिपल को दोषी माना जाता है । इस हत्याकांड के बाद बाल आयोग खमोश है मानव अधिकार का झंडा लेकर घूमने वाले भुमिगत होगये है । किसी भी संगठन संस्था ने दोषी मां-बाप समाज जिसने उस बच्चे के हाथ में हथियार थमा दिए उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की मांग नहीं की है ।
प्रिंसिपल अपनी जान से हाथ धो बैठी है स्कूल बदनामी के कटघरे में खड़ा है, लेकिन किसी ने भी मृतक प्रिंसिपल के लिए दो शब्द नहीं कहे, किसी ने भी इस घटना की निंदा नहीं की यानी नैतिकता की किताब जो कहीं खो गई है उसको बच्चों को ही नहीं पलकों को भी दोबारा से पढ़ा कर वह सबक याद करने की जरूरत है जिस में गुरु केवल गुरु नही भगवान का रूप हुआ करता था । जो हम सब भूल गए चुके है । यदि किस भी घटना के लिए उस प्रबंधक या प्रिंसिपल दोषी है तो फिर देश प्रदेश की घटनाओं के लिए प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री या उस विभाग के मंत्री को दोषी क्यो ना मना जाए । उधारण के लिए रेल हादसों, किसानों की आत्महत्या के लिए बेरोजगारी से तंग नौजवानों की आत्महत्या के लिए, बढ़ती महंगी के लिए सरकारों को भी दोषी माना जाए ।
✍आबिद मो खान
