भोपाल। निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण के कानून का प्रारूप कैबिनेट में प्रस्तुत हो गया और राजधानी में होते हुए स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी को पता ही नहीं चला। अफसरों ने कैबिनेट मंत्री की अनुपस्थिति में कानून का मसौदा राज्यमंत्री को दिखाना तक मुनासिब नहीं समझा। जोशी ने विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर इस पर आपत्ति दर्ज कराई है।
प्रदेश में अफसरशाही किस कदर हावी है। इस घटना से पता चलता है। विधानसभा में रखे जाने से पहले कानून को कैबिनेट से मंजूर कराना था। इससे पहले कानून के गुण-दोष पर मंत्री और विभाग के अफसरों के बीच चर्चा (ब्रीफिंग) होनी थी, लेकिन विभाग के कैबिनेट मंत्री विजय शाह भोपाल में नहीं थे।
ऐसे में भी अफसरों ने राज्यमंत्री जोशी से इस मसले पर चर्चा करना और उन्हें कानून का मसौदा उपलब्ध कराना मुनासिब नहीं समझा। जब दोपहर तीन बजे तक मंत्री शाह भोपाल नहीं पहुंचे और कानून के मसौदे पर कैबिनेट में चर्चा का समय आ गया। तब अफसरों को राज्यमंत्री जोशी की याद आई।
सूत्र बताते हैं कि मंत्री शाह से जोशी को फोन करवाया गया और उनसे कहा गया कि वे कानून पर कैबिनेट में चर्चा में शामिल हों। फिर राज्यमंत्री ने कैबिनेट में कानून का मसौदा रखने से साफ इंकार कर दिया। जानकारों का कहना है कि जब बात नया कानून बनाने की हो, तो उसका प्रस्तावित मसौदा कैबिनेट के साथ राज्यमंत्री को भी भेजा जाना चाहिए था। इतना ही नहीं, मसौदे पर चर्चा में राज्यमंत्री की भी उपस्थिति अनिवार्य होती है। उनके विचारों को भी तवज्जों दी जाना चाहिए।
बैकफुट पर आया विभाग
राज्यमंत्री की लिखित आपत्ति के बाद विभाग के अफसर बैकफुट पर आ गए हैं। सूत्र बताते हैं कि विभाग की प्रमुख सचिव दीप्ति गौड़ मुकर्जी ने राज्यमंत्री जोशी को बताया है कि उन्हें कानून का मसौदा भेजने की जिम्मेदारी विभाग के एक अन्य अफसर को सौंपी गई थी। उस अफसर ने लापरवाही बरती है।
मुझे पता तक नहीं था
कैबिनेट की बैठक के ठीक पहले तक मुझे पता ही नहीं था कि निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण का कानून इस बैठक में मंजूरी के लिए रखा जा रहा है। हां बाद में मुझसे कैबिनेट की बैठक में उपस्थित होने और मसौदे पर चर्चा करने को कहा गया था – दीपक जोशी, राज्यमंत्री, स्कूल शिक्षा विभाग
