मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जो नजदीक से जानता है, उसे पता है कि वे कभी किसी से सीधा मुकाबला नहीं करते. शालीनता और सौम्यता उनके मूल स्वभाव में है. मामला अपने राजनीतिक विरोधियों का हो या अपने प्रतिद्वंदियों का वे चुपचाप अपनी चालों से उन्हें मात करते रहे हैं. लेकिन इस समय वे कुछ असहज हैं. उनकी बॉडी लैंग्वेज उनका व्यवहार इस बात की तस्दीक कर रहा है कि कुछ ऐसा हो रहा है जो उनके लिए अप्रिय है. और इससे भी बढ़कर उनके एकाधिकार को चुनौती दे रहा है.
दर्द छलक उठा
माना जा रहा है कि भोपाल के आनंद विभाग के एक कार्यक्रम में मजाक में ही सही लेकिन उनका दर्द छलक उठा है. दरअसल पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को देखा जाए तो यह मजाक हकीकत के कुछ करीब लगता है कि – “मैं तो जा रहा हूं सीएम की कुर्सी पर कोई भी बैठ सकता है.”
मिशन 2019 का अप्रत्यक्ष दबाव
रिजल्ट देने का टास्क
पिछले दो चुनाव में केंद्र में यूपीए की सरकार थी. जिसके कारण एक केंद्र की राजनीतिक दखल उन पर नहीं थी. लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद हालात बदल गए हैं. सरकार चलाने की अतिरिक्त जवाबदेही और रिजल्ट देने का टास्क उनके उपर दिखाई देता है.
जिलों का नहीं सरकार का रिपोर्ट कार्ड
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग द्वारा चिन्हित किए गए प्रदेश के 8 पिछडे जिलों के कलेक्टरों के साथ मीटिंग की और एक एक का रिपोर्ट कार्ड मांगा कि ये जिले पिछड़े क्यों रह गए. कई कलेक्टरों के जवाब से वे संतुष्ट नहीं हुए. उन्हें चेतावनी दे गए कि जनता तक योजनाओं का क्रियान्वयन की ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी. इसे एक तरह से शिवराज सरकार के कमजोर रिपोर्ट कार्ड के बतौर देखा गया.
राजनीतिक परेशानियां
सरकार से हटकर कुछ राजनीतिक मामलों की बात करें तो वहां भी शिवराज सिंह थोड़े परेशानी में दिखाई देते हैं. प्रदेश अध्यक्ष के बतौर नंदकुमार चौहान की बिदाई और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी राकेश सिंह का अध्यक्ष बनना संगठन पर उनके एकाधिकार को खत्म करता है. संगठन के इस बदलाव से तय हो गया है कि अब टिकटों के वितरण में सरकार पर संगठन भारी होगा.
