बिलासपुर। कांग्रेस हर बार सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मंत्रियों के खिलाफ दमदार प्रत्याशियों पर दांव लगाती रही है जिसमें अपेक्षाकृत सफलता मिलती रही है। भले ही राज्य में वह लगातार तीन चुनाव हार चुकी है लेकिन कद्दावर मंत्रियां को हराकर उसने भाजपा को अपनी ताकत का अहसास हर बार कराया है। मगर इस बार कांग्रेस को कई स्थानों पर भाजपा सरकार के मंत्रियों के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी उतारने में मुश्किल पेश आ सकती हैं। ऐसी ही एक सीट बिलासपुर है।
गौरतलब है कि डॉ. रमन सिंह की सरकार के वरिष्ठ मंत्री अमर अग्रवाल यहां से लगातार चार बार से विधायक हैं। पिछले चुनाव में उन्हें घेरने के लिए कांग्रेस ने तत्कालीन महापौर वाणी राव को मैदान में उतारा था लेकिन वे हार गईं और अब पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस की शोभा बढ़ा रही हैं। वाणी कांग्रेस की काफी प्रभावशाली तथा सक्रिय नेता रही हैं वे छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। पिछले चुनाव में कांग्रेस द्वारा मंत्री अमर अग्रवाल के मुकाबले उन्हें प्रत्याशी बनाये जाने पर माहौल में काफी गर्माहट आ गई थी। यह बात अलग है कि शहर की जनता ने अमर अग्रवाल पर भरोसा कायम रखा। अमर इसके पहले मंत्री रह चुके बी.आर. यादव के पुत्र राजू यादव तथा अनिल टाह को भी पराजित कर चुके हैं। श्री टाह पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के कट्टर समर्थक हैं और उनके द्वारा कांग्रेस छोड़ने पर वे उनके साथ जा चुके हैं। बिलासपुर की राजनीति में जोगी का अपना एक अलग स्थान है। यहां जोगी समर्थकों की कोई कमी नहीं है। बल्कि यह कहा जाये कि जोगी के पार्टी छोड़ जाने के बाद यहां कांग्रेस में उत्साह वाली बात पहले जैसी नहीं रह गई है। यह तो तय है कि जोगी यहां से अपना प्रत्याशी उतारेंगे। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो यह चर्चा चल पड़ेगी कि जोगी की अमर से साठगांठ है। कांग्रेस के तमाम आला नेता पहले ही यह ताना मारते रहे हैं कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और जोगी की साठगांठ है। अमर और जोगी पुत्र अमित की नजदीकियों की चर्चा उस वक्त भी काफी जोरों पर थी, जब अमर किसी बात पर खिन्न होकर तब के भाजपा प्रदेश संगठन महामंत्री रामप्रताप सिंह को बंद लिफाफे में मंत्री पद से इस्तीफा देकर घर लौट आये थे। हालांकि बाद में वह मामला डॉ. रमन सिंह ने संयम और सौजन्यता से शांत कर लिया था। चर्चा तब भी थी जब कांग्रेस की टिकट पर जोगी की पत्नी डॉ. श्रीमती रेणु जोगी ने बिलासपुर लोकसभा चुनाव लड़ा और मुकाबले में थे भाजपा के दबंग नेता दिलीप सिंह जूदेव। चर्चा यह थी कि कहीं भीतरघात न हो जाये। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जूदेव शानदार तरीके से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। दरअसल राजनीति में चर्चाओं के पंख बड़े फुर्तीले होते हैं। तरह-तरह की चर्चायें होती हैं। सूत न कपास, जुलाहों में लठा-लठी की कहावत चरितार्थ होने वाली नौबत आ जाती है। खैर, उस प्रसंग को वहीं छोड़कर मौजूदा सियासी हालात पर नजर डालें तो जोगी की जनता कांग्रेस अमर के खिलाफ प्रत्याशी जरूर उतारेगी। यह तो उस प्रत्याशी के प्रभाव पर निर्भर करेगा कि वह अमर की राह में बाधा बनता है या कांग्रेस की। यह भी चर्चा है कि कांग्रेस और जोगी की कांग्रेस में चुनावी तालमेल हो सकता है। फिलहाल ऐसा नहीं लगता। वैसे अगर यह तालमेल हो भी जाये तो अमर अग्रवाल के सामने नहीं बल्कि विरोधी पक्ष के समक्ष यह मुश्किल होगी कि ऐसा प्रत्याशी कहां से लायें जिसे सब दिल से साथ दें। जो बात संयुक्त कांग्रेस में नहीं हो सकी, वह विभाजित कांग्रेस में कैसे सहज हो सकती है? दोनों कांग्रेसों के बीच तालमेल दिन में तारे देखने जैसी धारणा हो सकती है। ख्याली पुलाव पकाने की बजाय धरातल को छूकर देखें तो यहां कांग्रेस की जमीन दलदली समझ आती है। कांग्रेस में ऐसा कोई व्यक्तित्व सामने नही है जिसे मैदानी राजनीति का बेहतरीन अनुभव हो। कांग्रेस विधायक दल के नेता टी.एस. सिंहदेव का कहना है कि कई सीनियर नाम हैं इसलिए कोई एक नाम नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस में वर्षों से सेवायें दे रहे लोगों को सीनियर माना जायेगा या नये जुड़े व्यक्तित्व को? यहां मोटे तौर पर प्रदेश कांग्रेस सचिव अटल श्रीवास्तव और सीवी रमन यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रार पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस में आये शैलेन्द्र पांडेय का नाम उभर रहा है। मगर दिक्कत यह है कि क्या ये नाम बिलासपुर शहर में अमर अग्रवाल की सक्रियता का मुकाबला कर पायेंगे..
