विशेष लेख राजनीतिक समीकरण के साथ
।अशफाक कायमखानी।
हाल ही मे राजस्थान मे हुवे विधानसभा चुनावों मे कांग्रेस को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने मे प्रमुख भूमिका अदा करने वाला मुस्लिम समुदाय सत्ता मे अपनी हिस्सेदारी ठीक से ना मिलने के कारण काफी उदसीन व विचलित नजर आ रहा है।
एक अनुमानित आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस को चुनावों मे बीरादरी वार मिले मतो पर नजर डाले तो पाते है कि एससी 60%, एसटी 55%, जाट 40%, मुस्लिम 90%, गुर्जर 70%, माली 15%, राजपूत 40%, ब्राह्मण 20%,, वैश्य 10%, जैन 5% मत कांग्रेस को मिलना माना जाता है। जबकि आबादी के अनुसार मंत्री बनने वालो का आंकड़ा यहां आकर ठहरता है। राजस्थान में गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक
आबादी मन्त्री
एससी 20% – 4
एसटी 15% – 3
जाट 12% -4
मुस्लिम 11% -1
गुर्जर 6% -1+1=2
राजपूत 8% -2
ब्राह्मण 4% -2
वैश्य 1% -1
जैन 0.3% -2
शेष ओबीसी-3
मुख्यमंत्री- माली
उप मुख्यमंत्री- गुर्जर
कुल मन्त्री 23+2=25
खाली सीट -5
भारत की आज़ादी अपने साथ बंटवारा लाई लेकिन उस बंटवारे के समय जो मुस्लिम मज़हब के नाम पर नये देश में जाना चाहते थे वो गए पर अधिकांश ने भारत को ही अपना वतन मानकर यहां की मिट्टी को सलाम करते हुये यही रहने की चोईस रखकर भारत मे ही रहे। भारत की आज़ादी के बाद ही से पूरे भारत के मुस्लिम समाज का स्वाभाविक झुकाव कांग्रेस की तरफ़ रह। जिसकी वजह कोंग्रेस के साथ मिल कर मुसलमानों ने देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों के साथ बरसों बरस जंग लड़ी और हर तरह की कुर्बानी दीं एवं उस समय मुसलामानों को लगा कि कांग्रेस उनकी हितैषी पार्टी है। जिसके चलते उन्हें किसी अन्य पार्टी की तरफ शायद भविष्य मे देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय की इसी सोच को समझते हुये तब से आज तक भारत के मुसलमानों को कांग्रेस का निजी वोट बैंक माना गया और मुसलामानों ने इस बात को हर चुनाव में सही सिद्ध भी किया।
हालांकि मुसलमानों को वोटबैंक बनने से कोई बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ बल्कि भाजपा और हिंदूवादी राजनैतिक दलों ने मुसलमानों को अछूत मान कर उनसे दूरी बना ली।जिसके कारण ये दूरी हर चुनाव के बाद बढती रही और अनजाने ही मुसलमान मोहरे की तरह इस्तेमाल होते रहे। इसका फायदा मुस्लिम को छोड़कर हर राजनैतिक दल को मिलता आ रहा है। जबकि कालांतर में मुसलमानों के लिए चुनने के लिये और भी दुसरे राजनीतिक दल सामने आने लगे थे। 2014 के संसदीय चुनाव तो भाजपा ने मुस्लिम विरोध के आधार पर जीता था।इन चुनावो मे कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई थी। इससे इस बात को और पुख्ता कर दिया कि अगर मुसलमान लाम-बंद हो कर उसके पक्ष में वोट ना दें तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान होगा.
मोदी सरकार की मुस्लिम विरोधी नीतियों व उसके सहयोगी संगठनों के आक्रमक रुख और भाजपा शासित राज्यों में हुए मुसलमानों के साथ भेदभाव, अत्याचार, मोबलिंचींग, और अपमानजनक दोगले व्यवहारों ने मुसलमानों को अपने वोट की ताक़त को पहचानने और उसे सरकारें बदलने में एवं कांग्रेस के बूने जाल मे फंसने के लिए मजबूर किया। हमारे देश की जाति आधारित राजनीति में चुनावों में टिकिट का आधार जातिगत समीकरण होते हैं। और मुसलमानों को छोड़कर हर जाति को उसकी जनसँख्या के आधार पर टिकिट बांटे जाते हैं। 2014 के बाद भाजपा को तो खैर पूरे गुजरात, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव लड़ाने योग्य नहीं मिला, राजस्थान और मध्यप्रदेश प्रदेश में एक एक उम्मीदवार मुस्लिम मिले भी तो बलि के बकरे बनते हुये हार गये। हाँ कांग्रेस ने स्थिति को भांपा और मुसलमानों को टिकट बांटे हालांकि अनुपात वो अब भी पर्याप्त नहीं थे। लेकिन इससे मुसलामानों को थोड़ी तसल्ली तो मिली और मुसलमानों ने भारत की एकता, अखंडता और भाईचारे को खत्म करने वाली ताक़तों को सबक सिखाने के लिए एक साथ मिल कर अपने वोट का इस्तेमाल कांग्रेस के पक्ष में किया। और कान्ग्रेस को अप्रत्याशित जीत दिलाने के आंकड़े गवाह हैं कि राजस्थान में कांटे की टक्कर के बीच कान्ग्रेस वहां वहां जीती जहाँ जंहा मुसलमानों की भरपूर वोटिंग हुई।
कोंग्रेस ने 15 मुस्लिमों को टिकट दिए जिनमें 14 सीटों पर चुनाव हुये जिनमें से 7 ने जीत दर्ज की और दूसरी जातियों के प्रत्याशियों के मुकाबले तुलनात्मक रूप से अच्छा प्रदर्शन किया। उम्मीद की जा रही थी कि 7 में से तीन विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल कर समाज को धन्यवाद और सम्मान दोनों दिया जाएगा। लेकिन हुआ इसके बिलकुल उलट? जिसके चलते राजस्थान के मुस्लिम समुदाय को घोर निराशा हाथ लगी। 13% आबादी वाले जाटों के 4 मंत्री, 7% आबादी वाले गुर्जरों के 2 मन्त्री, 8% आबादी वाले राजपूतों के 2 मन्त्री, 4% आबादी वाले ब्राह्मणों के 2 मन्त्री, 1% आबादी वाले वैश्यों का 1 मन्त्री और 0.3% आबादी वाले जैन समाज के 2 मन्त्री और 11% आबादी वाले और 7 विधायकों वाले मुसलामानों का सिर्फ़ एक ही मंत्री वो भी शायद किसी ग़ैर महत्वपूर्ण मंत्रालय का मंत्री होगा. ऐसा क्यों हुवा जिसपर समुदाय मे जगह जगह मंथन हो रहा है।
कांग्रेस अब भी मुस्लिम वोटों की क्या ताक़त नहीं पहचान पा रही या मुसलमान विधायकों में योग्य व्यक्तियों की कमी है या कोंग्रेस इस ग़लतफ़हमी की शिकार है की मोदी व भाजपा के कारण अब तो वोट मिल ही गये व चुनाव जीत ही गए अब क्या डर और क्या फ़िक्र? जबकि भाजपा के गए बार जीते हुए 2 विधायकों में से एक को केबिनेट मंत्री बनाया गया, बहुत महत्वपूर्ण विभाग दिए गए और 5 साल तक उन्हें लगभग उपमुख्यमंत्री ही जाना जाता रहा है।
कोंग्रेस के पिछले कार्यकाल में भी दुर्रु मियां को कैबिनेट मंत्री, अमीन खान और नसीम अख्तर इंसाफ को राज्य मंत्री बनाया गया था। साथ ही आख़िरी साल में ज़ाहिदा ख़ान को संसदीय सचिव बनाया गया था। तो इस बार समाज को क्यों नहीं उचित प्रतिनिधित्व दिया जा रहा? जो की उसका स्वाभाविक और जायज़ हक है।
क्या कोंग्रेस के चाणक्यों और रणनीतिकारों को दूसरी पार्टियों ख़ासकर बसपा और आरपीएल के धीमे धीमे बढ़ते क़दमो की आहट सुनाई नहीं दे रही? राज्यों के चुनाव से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण केन्द्रीय चुनाव दो हाथ की दूरी पर खड़े हैं और कांग्रेस अगर चाहती है के उसकी जीत का कारवां शान से आगे बढ़ता रहे तो उसे मुसलमानों को उनका जायज़ हक दे कर उन्हें राजनीतिक रूप से मज़बूत करना होगा, वरना- “वो जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई”
इतिहास खुद को दोहराता ज़रूर है, लेकिन ग़लतियों को सुधारने के मौके बार बार नहीं देता। कांग्रेस के निशान पर जीते 99 सीटो में से 82 सीट मुस्लिम वोट से जीती हैं। अगर मुस्लिम वोट 90% की बजाए 60% तक मिलता, तो कांग्रेस को राजस्थान में सिर्फ 45 सीट मिलती।
