बीते विधानसभा चुनाव में एक नारा भारतीय जनता पार्टी की ओर से काफी प्रमुखता के साथ उछाला गया था। वह था- माफ करो महाराज हमारा नेता तो शिवराज। बीते रोज वहीं महाराज और शिवराज जब गले मिले तो आम आदमी तो भौचक्का हुआ ही, मीडिया भी एक बार तो देखता ही रह गया। क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर का नजारा बीते रोज एकदम से बदला हुआ था। वहां उनके धुर विरोधी रहे और उनके व्यक्तिगत निशाने पर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया का आगमन हुआ था। शायद यह उम्मीद स्वयं शिवराज सिंह चौहान को भी नहीं रही होगी कि जिन्हें वे पूरे चुनाव में पानी पी पीकर कोसते रहे वही ज्योतिरादित्य सिंधिया 1 दिन अचानक मुस्कुराते हुए उनके घर आ पहुंचेंगे और प्रसन्नता के साथ मेल मुलाकात करेंगे। लेकिन सियासी जानकार यह मानने को तैयार नहीं है कि उक्त मुलाकात अप्रत्याशित अथवा अचानक घटित घटना है। ऐसा माना जा रहा है कि यह भरत मिलाप बेहद सोची समझी रणनीति का काफी महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों नेता लंबी बैठक के बाद भले ही मीडिया से यह कह रहे हो कि उनकी मुलाक़ात सौजन्य वस थी। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि चुनाव के दौरान शिवराज और महाराज का जो वाक युद्ध आक्रामकता के साथ चला क्या वह भूलने योग्य है। वह भी तब जब भाजपा की ओर से पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान हमले कांग्रेस की बजाए व्यक्तिगत रूप से महाराज यानी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पर ही किए। गए उस पर तुर्रा यह कि उक्त शाब्दिक हमले सबसे ज्यादा शिवराज सिंह चौहान के द्वारा ही किए गए। यहां तक कि अनेक चुनावी सभाओं में सिंधिया को सन 57 का गद्दार तक कहा गया। भाषणों में उन्हें सामंतवादी बताया गया और व्यक्तिगत प्रहारों से आहत किया गया। उन सब बातों को भूलकर भी यह भरत मिलाप सामने आया है तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसे मामूली घटनाक्रम के रूप में नहीं लिया जा सकता। हां यदि नए राजनीतिक परिवेश पर गौर करें तो यह दोनों विरोधी दलों के महत्वपूर्ण नेता दरअसल एक ही तीर के दो शिकार नजर आते हैं। यदि इस नजरिए से देखा जाए तो राजनीतिक जानकार यह मानेंगे कि अंततः तो यह होना ही था। मतलब साफ है बीते विधानसभा चुनाव में शिवराज और महाराज ही थे जिन्होंने अपनी अपनी पार्टी में सबसे ज्यादा मेहनत और सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं संबोधित की। इसमें भी कोई शक नहीं कि इन दोनों ने अपनी अपनी पार्टियों को विजय श्री दिलाने में एड़ी चोटी का जोर लगाया था। लेकिन अब यदि चुनाव के बाद के परिदृश्य पर नजर डाली जाए तो दोनों ही नेता शिवराज और महाराज अपने अपने खेमे में हाशिए पर नजर आते हैं। वरना इन दोनों को अपनी अपनी पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन अब वास्तविकता यह है कि जब कांग्रेस चुनाव जीत चुकी है और भाजपा हार गई है तब शिवराज और महाराज अपने अपने मन वांछित फलो से वंचित हैं। माना जा रहा था एक मुख्यमंत्री बनेगा तो उनके स्थान पर नाथ की ताजपोशी हो चुकी है और दूसरे को उम्मीद थी कि पार्टी कम से कम नेता प्रतिपक्ष का पद तो देही देगी लेकिन वहां गोपाल भार्गव विराजित हैं। यानि कि दोनों ही नेता सही मायने में अपनी कद और काठी के लिहाज से उपेक्षित ही कहे जा सकते हैं। वर्तमान में ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने क्षेत्र के सांसद मात्र हैं तो शिवराज सिंह चौहान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद देकर दिल्ली बुलाए जा चुके हैं। इन सभी घटनाक्रमों को देखते हुए जनता भी यह कयास लगा रही थी कि यह दोनों नेता खामोश कैसे बैठे हुए हैं। क्योंकि यह बात दावे के साथ कहीं जा सकती है की कांग्रेस सरकार में कमलनाथ की ताजपोशी और विपक्षी भाजपा में गोपाल भार्गव का नेता प्रतिपक्ष चुना जाना महाराज और शिवराज दोनों को ही रास नहीं आया है। अतः लिखने में कोई गुरेज नहीं की दोनों नेता अपनी अपनी पार्टी के प्रमुखों द्वारा लिए गए फैसलों से खिन्न है और अब जब दोनों प्रसन्न चित्त भाव से अपने सारे विरोधों को भुला कर मिल रहे हैं तो कयास यह लगाए जा रहे हैं कि लंबी बैठक के दौरान दोनों के बीच ऐसी कोई बात तो हुई है जो इन दोनों महत्वपूर्ण नेताओं को एक ही पाले में खड़ा होने के लिए मजबूर करती है। बस यही वह सवाल है जो भाजपा और कांग्रेस के प्रमुखों को खटक रहा होगा जो आने वाले समय में उनकी नींद में भी उड़ा सकता है। अब देखना यह दिलचस्प रहेगा कि आने वाले समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष के यह दोनों कद्दावर नेता अपने अपने राजनीतिक दलों में कौन-कौन से गुल खिलाते हैं और मध्य प्रदेश की राजनीति भविष्य में किस करवट बैठती है।
मोहनलाल मोदी की कलम से
