छतरपुर। एक शासकीय कॉलेज में अतिथि विद्वान के रूप में काम कर रहीं डॉ. रीना पाण्डेय ने सरकार के महिला सशक्तिकरण के दावों को छलावा बताया है। उन्होंने कहा कि सभी शासकीय कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश की सुविधा मिलती है लेकिन अतिथि विद्वान इस सुविधा से वंचित है। डॉ. पाण्डेय ने मातृत्व अवकाश की सुविधा के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।
डॉ. पाण्डेय ने बताया कि उनकी 5 साल की बेटी और 5 माह का नवजात बेटा है। दोनों मेजर ऑपरेशन से हुए इस ऑपरेशन में डॉ. 6 माह तक आराम की सलाह देते है। लेकिन अतिथि विद्वानों को यह सुविधा नहीं मिलती। उन्होने बताया कि गत वर्ष 6 अगस्त को उन्हे डिलेवरी हुई और 8 सिम्बर को उन्हें हरपालपुर के शासकीय पीजी कॉलेज में जाकर अतिथि विद्वान व्यवस्था में ज्वाईन करना पड़ा। उन्हे रोजाना 120 किलोमीटर आना-जाना पड़ता है। कभी अपने छोटे से बच्चे को लेकर तो कभी बेटी को लेकर। उन्होने मातृत्व अवकाश प्राप्त करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की है। इतना ही नहीं महिला आयोग उच्च शिक्षा विभाग को भी आवेदन भेजे है। डॉ. रीना पाण्डेय ने कहा कि महिला सशक्तिकरण शब्द सामान्य महिलाओं के लिए नहीं है। यदि उन्हें नौकरी करनी है तो अपने बच्चों और परिवार की देखरेख और अपनी सुरक्षा को व्यवस्था के नाम बली चढ़ाना है।
उन्होंने शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए है। उन्होंने कहा कि जिन महिलाओं के पास न पैसे की ताकत है न राजनीति की ताकत है उनके लिए न्याय के नाम पर आयोग संस्था आदि सब बेमानी है। उन्होने सवाल उठाया कि क्या अतिथि विद्वान के रूप में काम कर रही महिलाओं को मां बनने और अपने बच्चों का पालन-पोषण करने का अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं यह व्यवस्था महिलाओं को बढ़ावा देने की बात तो करती है लेकिन उन्हें प्राथमिकता नहीं दी जाती। अतिथि विद्वान को केवल 6-7 महीने काम करने का मौका मिलता है और यदि स्थाई प्रोफेसर आ गया तो नौकरी से निकाल दिया जाता है।
