पंकज शुक्ला@9893699941/सुबह सवेरे/मंडे मैपिंग
तारीख का ऐलान हो चुका है। विधानसभा चुनाव की बिसातें बिछ चुकी हैं। दोनों मुख्य दलों भाजपा और कांग्रेस के साथ मुकाबले को बहुकोणीय बनाने वाले घटकों की सेनाएं सज चुकी हैं। दोनों खेमों के योद्धा तैयार हैं। एक-दूसरे पर वार जारी हैं। इधर, उपलब्धियों का राग है तो उधर, सत्ता विरोधी लहर से चुनाव वैतरणी पार करने की आस है। वादें और अधूरे वादों की उपजी नाराजी का लाभ है। भाजपा और कांग्रेस सत्ता सिंहासन पाने की हर जुगत भिड़ा रही है। दोनों की कोशिशों के स्तर अलग-अलग है मगर एक अंतर साफ दिखाई दे रहा है कि कांग्रेस का हमला होने के पहले ही या होते ही भाजपा उसकी बड़ी काट प्रस्तुत कर देती है। जबकि, बतौर विपक्ष कांग्रेस अभी अपने हमलों में उतना पैनापन और निरंतरता नहीं ला पाई है कि भाजपा खेमा बैचेन हो जाए। कांग्रेस की कोशिशों में यह थोड़ी सी कमी ही भाजपा के लिए सुकून का सबब है।
यूं तो यह लोकतंत्र की जंग है मगर यह संघर्ष राजशाही के दौर के किसी युद्ध से कम भी नहीं है। साधन भिन्न है मगर लक्ष्य केवल विजय ही है। चूंकि, यहां शक्तिबल से किसी के प्राण लेकर विजय हासिल नहीं करना है तो संघर्ष कम मारक है मगर पैंतरे वहीं साम, दाम, दंड, भेद वाले हैं। और इन पैतरों में कांग्रेस की प्रकृति डट कर आंख से आंख मिला कर लड़ने की नहीं, छापामार गौरिल्ला युद्ध की तरह प्रतीत हो रही है। इसके अधिकांश नेता प्रदेश में निरंतर सक्रिय नहीं है। वे समय-समय पर सक्रिय होते हैं और छुटपुट हमले करते हैं और वापस ‘अज्ञातवास’ पर चले जाते हैं।
कांग्रेस नेताओं के राजनीति करने का ढंग चंद्रमा की कलाओं की तरह है। वे कभी तो एकदम बढ़ना शुरू कर देते हैं और उनकी राजनीति पूर्णिमा के चांद की तरह चमक उठती है तो कभी वे एकदम अमावस्या की रात में न दिखाई देने वाले चांद की तरह ओझल हो जाते हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी सक्रिय होते हैं तो सभी नेता एकमंच पर दिखाई देते हैं। प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में होते हैं तो पूरा कार्यालय काम करता नजर आता है अन्यथा तो यहां तीन-चार पदाधिकारियों के अलावा कोई नजर नहीं आता। चुनाव जैसे लोकतंत्र के पर्व के समय में भी मुख्य दल के प्रदेश कार्यालय में मरघटिया शांति होना अच्छे संकेत नहीं होते।
कांग्रेस को इतिहास से सबक ले कर सीखना होगा कि भारतीय राजाओं की सेनाएं संख्या बल में अधिक होने के बाद भी आक्रामणकारियों से हारी क्योंकि संख्या का तब तक कोई मतलब नहीं होता जब तक वह एक रणनीति और एक कमान के तहत संगठित न हो। राजपूतों के पास विशाल सेनाएं थीं मगर वे हर बार अपने दोषों के कारण परास्त हुए। कभी गुणों की जगह खेमे के प्रति निष्ठा और जाति को तवज्जो दी गई तो कभी तकनीक से मुंह चुरा कर नुकसानदेह परंपराओं को ही लादे रखा गया। बार-बार पराजय के बाद भी रणनीतिक रूप से कोई बदलाव नहीं किए गए। पुरातन शौर्य के सहारे वर्तमान की लड़ाई में हौंसला बनाए रखा जा सकता है विजय हासिल नहीं की जा सकती।
हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष नाथ ने 40 दिन 40 सवाल की मुहिम छेड़ी है और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं मगर ट्वीट और प्रश्नों के जरिए सरकार को घेरने का प्रयास सत्ता पक्ष की आतिशबाजी के सामने कांग्रेस का फुलझड़ी प्रयास ही माना जाना चाहिए। अब तक कांग्रेस के हमलों में इतना पैनापन नहीं आया है कि उसके खुद के प्रवक्ता भी मुतमईन हो जाएं। वे भी अपनी तैयारियों को आधा-अधूरा ही मानते हैं। कांग्रेस को यह बात समझने में देरी लग रही है। बेहतर हो कि टिकट वितरण की माथापच्ची में उलझे नेता यह भी सोचें कि मैदान में सक्रिय होना भी उतना ही आवश्यक है। वे दिल्ली में बैठ गुणा भाग करने के फेर में यहां जनता के बीच पूरा मैदान खाली छोड़ बैठे हैं। पूरी कांग्रेस इसी भरोसे है कि इस बार जनता नाराज है और वह सत्ता बदलने को आतुर बैठी है। जनता ने यह आतुरता न दिखाई तो पांच साल बाद ही मुकाबला होगा।
