सैयद ख़ालिद कैस समुह सम्पादक @9009217594,8770806210
भोपाल – आज़ादी के बाद देश भर में देश को आज़ाद करानें के लिये अपने प्राणो की आहूति देने वालों के नाम उजागर हुये , देश ने पूरी शिददत से उनको याद किया । हमारे पाठय पुस्तकों में उनके जीवन परिचय को शामिल कर सरकार ने उनको हमारे
मन मस्तिष्क में अमर कर दिया । परन्तु पिछले कुछ वर्षों से आईं कुंठित मानसिकता की सरकारों ने देश में सच्चे और वास्तविक क्रांतिकारियों के बीच मनघडंत और स्वघोषित क्रांतिकारियों को ला खड़ा किया और एक साज़िश के तहत वास्तविक क्रांतिकारियों को नज़र अंदाज़ कर दिया है । ख़ैर आजका दिन भारतीय इतिहास में कई मायनो में महत्त्वपूर्ण है आज गंगा जमनी तहज़ीब के पेरौकार महान क्रान्तिकारी अश्फाक उल्लाह ख़ान की जयंती है । देश के इस सच्चे और वास्तविक क्रान्तिकारी को शत शत नमन ।
अशफ़ाक उल्लाह ख़ान एक महानायक
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के शहीदगढ शाहजहाँपुर में रेलवे स्टेशन के पास स्थित कदनखैल जलालनगर मुहल्ले में 22 अक्टूबर 1900को हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला ख़ाँ था। उनकी माँ मजहूरुन्निशाँ बेगम बला की खूबसूरत खबातीनों (स्त्रियों) में गिनी जाती थीं।
अशफाक उल्लाह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे।
उन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
ब्रिटिश फिरंगियों ने उनपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर 1927 को उन्हें फाँसी दे दी गई।
राम प्रसाद बिस्मिल की तरह अशफाक उल्लाह खां भी उर्दू भाषा के बेहतरीन शायर थे।उनका उर्दू तख़ल्लुस (उपनाम )”हसरत”था।
उनका पूरा नाम अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत था।
इतिहास में बिस्मिल और अशफाक की भूमिका निविर्वाद रूप से हिन्दू मुस्लिम एकता का अनुपम आख्यान है।
अशफ़ाक़ ने स्वयं अपनी डायरी में लिखा है कि जहाँ एक ओर उनके बाप-दादों के खानदान में एक भी ग्रेजुएट होने तक की तालीम न पा सका वहीं दूसरी ओर उनकी ननिहाल में सभी लोग उच्च शिक्षित थे। उनमें से कई तो डिप्टी कलेक्टर व एस० जे० एम० (सब जुडीशियल मैजिस्ट्रेट) के ओहदों पर मुलाजिम भी रह चुके थे। अब उनकी आलीशान कोठी बाकी है ।
अशफ़ाक़ अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। सब उन्हें प्यार से अच्छू कहते थे। एक रोज उनके बडे भाई रियासत उल्ला ने अशफ़ाक़ को बिस्मिल के बारे में बताया कि वह बडा काबिल सख्श है और आला दर्जे का शायर भी, गोया आजकल मैनपुरी काण्ड मॅ गिरफ्तारी की वजह से शाहजहाँपुर में नजर नहीं आ रहा। काफी अर्से से फरार है खुदा जाने कहाँ और किन हालात में बसर करता होगा। बिस्मिल उनका सबसे उम्दा क्लासफेलो है। अशफ़ाक़ तभी से बिस्मिल से मिलने के लिये बेताब हो गये। वक्त गुजरा। 1920 में आम मुआफी के बाद राम प्रसाद बिस्मिल अपने वतन शाहजहाँपुर आये और् घरेलू कारोबार में लग गये। अशफ़ाक़ ने कई बार बिस्मिल से मुलाकात करके उनका विश्वास अर्जित करना चाहा परन्तु कामयाबी नहीं मिली। चुनाँचे एक रोज रात को खन्नौत नदी के किनारे सुनसान जगह में मीटिंग हो रही थी अशफ़ाक़ वहाँ जा पहुँचे। बिस्मिल के एक शेर पर जब अशफ़ाक़ ने आमीन कहा तो बिस्मिल ने उन्हें पास बुलाकर परिचय पूछा। यह जानकर कि अशफ़ाक़ उनके क्लासफेलो रियासत उल्ला का सगा छोटा भाई है और उर्दू जुबान का शायर भी है, बिस्मिल ने उससे आर्य समाज मन्दिर में आकर अलग से मिलने को कहा। घर वालों के लाख मना करने पर भी अशफ़ाक़ आर्य समाज जा पहुँचे और राम प्रसाद बिस्मिल से काफी देर तक गुफ्तगू करने के बाद उनकी पार्टी के ऐक्टिव मेम्बर भी बन गये। यहीं से उनकी जिन्दगी का नया फलसफा शुरू हुआ। वे शायर के साथ-साथ कौम व समाज मुल्क के खिदमतगार के साथ आने वाली नस्लो के हीरो भी बन गये ।
