भोपाल – कल भोपाल विलीनिकरण के नाम पर एक पार्टी विशेष और उसके समर्थको द्वारा दिन भर सोशल मीडिया पर वर्ग विशेष के क्रान्तिकारी नेताओ का गुणगान किया वहीँ जानबूझकर उस अभियान या स्वतंत्रता संग्राम मे मुसलमान क्रांतिकारियों के उपेक्षा दर्शित होना नितान्त चिंतनीय है । स्वतँत्रता आँदोलन हो या भोपाल विलीनीकरण आँदोलन दीगर वर्गो के क्रांतिकारियों के साथ मुस्लमान रहनुमाओं की भूमिका को नज़र करके नये इतिहास की अवधारणा न्याय संगत नही होगी । वर्तमान अवसरवाद की राजनितिक विचारधारा की सोच शहीदो के साथ अन्याय कर रही हें ???
श्री असरार अली ने अपने एक लेख मे लिखा था कि आज समाचार पत्रों मे पढ़ा कि विलिनिकरण आंदोलन के नाम पर हिन्दु मुस्लिम कि खाई पैदा कि जा रही हे प्रजामंडल का इतिहास नही जानते शायद ये लोग ओर इन लोगो मे से कुछ नाम अपनी जुबान से लेना नही चाहते हैं , जिनके बगैर यह आँदोलन अधूरा है । पं चतुर नारायण मालवीय, गोविन्द प्रसाद श्रीवास्तव, सईदुल्लाह खान रजमी, भगवान दयाल निशात, इनयातुल्लाह तरज़ी मशरिकी, दमरू लाल भारतीय, पर्वतमल जैन, ज़हूर हाश्मी, अख़लाक़ मो खान, पं उद्धवदास मेहता, मो अरशद हुसैन, मोहिनी देवी, कुद्दूस सेवाई, मास्टर लाल सिंह, अबू सईद बज़्मी, मथुरा प्रशाद, हामिद रिज़वी, कामता प्रसाद, जौहर कुरैशी, भेरो प्रसाद, लुत्फुल्लाह खान नजमी, ।
अरबी और फ़ारसी के बड़े विद्वान सिद्दीक हसन ख़ान (1832-90) एक गरीब परिवार से थे, पर उन्होंने भोपाल की शाहजहाँ बेगम से निकाह किया। जिसके बाद वे ‘नवाब’ सिद्दीक हसन ख़ान के नाम से जाने गए। ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में हमेशा शामिल रहने के कारण सिद्दीक हसन ख़ान, भोपाल राज्य में तैनात ब्रिटिश रेजीडेंट के लिए हमेशा सिरदर्द बने रहे।
लेकिन आज भोपाल टाकीज़ चोराहे स्थित उनकी मज़ार पर फुल चढ़ाने वाले कोई नही पहुंचे।
भोपाल के वरिष्ठतम पत्रकार एस असरार अली केअनुसार सरकार को महान क्रांतिकारी बरकतुल्लाह भोपाली की याद नही आती बरकतुल्लाह भोपाली जिन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनायीं थी. सौ साल पहले जब आवागमन के साधन नहीं थे, तब इस महान क्रांतिकारी और गदर पार्टी के नेता ने विदेश में बसने वाले भारतियों को आज़ादी की लड़ाई के लिए तैयार करने और जापान से अमरीका, मलाया से कनाडा तक भारत की आज़ादी के लिए इन तमाम देशों में इंकलाबियों के नेटवर्क को तैयार करने में अपनी ज़िंदगी लगा दी थी, इनका इरादा उत्तर से हमला कर अंग्रेज़ों को भारत से भगाने का था. प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने की वजह से ये प्लान मुकम्मल नहीं हो पाया मगर जो अलख जगाई गयी और जो इंकलाब के दीवाने तैयार हुए, उसी की वजह से दो दशकों बाद सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी को जान की बाज़ी लगाने वाले दीवानों का पूरा नेटवर्क तैयार मिला. बरकतुल्लाह को अमरीका में दफ़न किया गया, इस वसीयत के साथ कि आज़ादी के बाद हिंदुस्तान मुन्तक़िल कर दिया जायेगा. ये किसे मालुम था, ऐसी बेगैरत सरकारें आएँगी जो इन महान देशभक्तो को ही भुला देंगी.। वह बरकत उल्लाह भोपाली थे जिन्होने 1915 मे काबुल मे पहली निर्वासित सरकार बनाई थी , जिसके प्रथम राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिँह थे और खुद मौलाना इसके प्रथम प्रधानमँत्री । आज केलिफोर्निया मे हजारो मील दूर दफन मौलाना अपनी आखरी वसीयत को पूरी होने का इन्तेज़ार कर रहे हैं । अँगरेज़ सरकार की नाक मे दम करने वाले बरकत उल्लाह 27सितम्बर 1927 को अपने प्यारे मुल्क को आज़ाद देखने की चाह लिये दुनिया से कूच कर गये । क्या ? बरकत उल्लाह की कुर्बानियों को भुलाया जा सकता है ।
एक ऐसी ही दिलचस्प और विचारोत्तेजक किताब है, सीमा अलवी की पुस्तक “मुस्लिम कॉस्मोपॉलिटनिज़्म इन द एज़ ऑफ एंपायर”। यह किताब उन पाँच मुस्लिम विद्वानों के जीवन और विचारों का ऐतिहासिक ब्यौरा देती है, जो अपनी ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के चलते कभी कंपनी के अधिकारियों और आगे चलकर अंग्रेज़ी राज़ के लिए सिरदर्द बने रहे। ये पाँच शख़्स थे: इमदादुल्लाह मक्की, जफर थानेसरी, रहमतुल्लाह कैरानवी, सैयद फ़द्ल और सिद्दीक हसन ख़ान।
सीहोर में रिसालदार मोहम्मद अली खान और उनके साथियों ने यूनियन जैक उतार दिया था और सीहोर कई महीनों तक आज़ाद रहा था. ये सारे जंग-ए-आज़ादी के क्रांतिकारी, बाद में मारे गए. शिवराज सिंह चौहान तो खुद सीहोर के हैं, इनको ये अज़ीम शहादत तक नहीं पता? ऐसे एक दो नहीं सैकड़ों शहीद हैं नाम भी बर्दाश्त नही मगर रेप्रेज़ेंटेशन के लिए ही सही, एक भी ईन क्रांतिकारी का नाम या तस्वीर शामिल न करके इन्होने अपना परिचय स्वतंत्रता संग्राम नायको से नाम,निशान,नागरिक, भेदभाव से ज़ाहिर क्यो किया है ???
श्री असरार अली के अनुसार खान शाकिर अली खान के स्तंभ को स्वच्छता अभियान के पोस्टर से छिपाना जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानीयो के निशानात स्वतंत्रत पहचान व बुलंद आवाज़ स्मृतियो को दबाया जाना अफसोसनांक है । खान शाकिर अली खाँ ही वह शख्स था जिसने भोपाल रियासत के खिलाफ़ झँडा बुलंद किया और आखिर भोपाल को आजादी दिलवाई ।
आज के नौ सीखिये वही बोल बोल रहे है जो उनको संघी पाठशाला मे सिखाया गया । वह कभी यह बर्दाश्त नही कर सकते की हिन्दुस्तान या भोपाल की आज़ादी मे मुसलमानो की भूमिका उजागर हो । यह उस पाठशाला से निकले हैं जिनके संस्थापक या तो अंग्रेजो के ताबेदार थे या मुखबिर । जिनकी मुखबिरी से क्रांतिकारियों को फाँसी के फंदे नसीब हुये हैं । यह उस नस्ल से संबंध रखते हैं जिनका भारत की आज़ादी मे कोई योगदान नही रहा । तथाकथित क्रांतिकारी बनाकर अपने पूर्वजो को पुजवाने वाले यह इतिहास को बदलने का कुचक्र चला सकते हैं परँतु इतिहास बदल नही सकते है । आज भी इतिहास मे इनके पूर्वजो के नाम काली सियाही से लिखे हैं । और वह इतिहास सम्पूर्ण विश्व मे पाया जाता है , भारत मे बदल भी दोगे तो क्या हुआ विश्व के इतिहास मे अब भी मुसलमान क्रांतिकारियों और उनकी कुर्बानियों का भंडार भरा है ।
@सय्यद खालिद कैस 9009217594,8770806210
