@वसीम अकरम त्यागी की कलम से
देशभर में नस्लवादी क़ानून के ख़िलाफ आंदोलन चल रहा है, लेकिन सरकार को लगता है कि अगर यह क़ानून वापस लिया तो उसकी ‘हार’ होगी। इस सरकार के लिये हर चीज़ हार और जीत ही है, देश हारे या जीते इससे क्या फर्क पड़ता है लेकिन ‘दो आदमी’ नहीं हारने चाहिए।
आंदोलन के विरोध में सत्ताधारी लोग रैलियां, और सभाएं तो कर रहे हैं, ताकि सीएए को ‘समझा’ सकें, लेकिन ‘हार’ मानने के लिये तैयार नही है। क्योंकि हार से डर लगता है, सरकार को लगता है कि अगर इस नस्लवादी क़ानून को वापस ले लिया तो ‘वोट बैंक’ खिसक जाएगा। लगभग 100 साल से आरएसएस द्वारा गलत दिशा में की गई मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
इसलिये ‘एक इंच’ भी पीछे नहीं हटने की सौगंध ली जा रही है।
आरएसएस भाजपा ने ऐसे जॉम्बी तैयार किए हैं, जिनकी खुराक नफरत है। इनके दिमाग़ों में इस्लामोफोबिया बैठाकर, आंखों में ‘हिंदू राष्ट्र’ का सपना सजाया गया है। हो सकता है मौजूदा सरकार इसमें जीत जाए लेकिन ‘देश’ हार जाएगा। सीएए जैसे नस्लवादी क़ानून के ख़िलाफ जितने आंदोलनकारी सड़कों पर हैं, ये सब इस ‘देश’ को बचाने के लिये लड़ रहे हैं।
भले ही सत्ताधारी दल की चाटुकारिता करने वाला मीडिया इन्हें बदनाम करे, सत्तारूढ़ दल इन्हें ‘भ्रम’ में फंसा हुआ बताए, लेकिन इस सच्चाई से कैसे मुंह मोड़ा जाएगा कि यह एक नस्लवादी क़ानून है। इस इस देश में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बोद्ध, पारसी, नास्तिक सदियों से रहते आ रहे हैं, फिर इस ऐसा क़ानून क्यों लाया गया जिसमें नागरिकता देने का आधार सिर्फ धर्म हो?
असम का उदाहरण आपके सामने है, वहां एनआरसी हुई है, जिसमें 19 लाख से ज्यादा लोग यह सिद्ध ही नहीं कर पाए कि वे भारतीय हैं या घुसपैठिया, यह सिर्फ इत्तेफाक है कि इन 19 लाख में से 15 लाख के आस पास हिंदू धर्म से संबंध रखने वाले लोग थे। यह क़ानून उन 15 गैरमुस्लिम को तो नागरिकता दे देगा, लेकिन जो मुस्लिम हैं, उन्हें डिटेंशन सेंटर भेज देगा।
अब इतनी बड़ी संख्या को किस देश भेजा जाएगा? कौन देश उन्हें बसाएगा? और क्यों बसाएगा? यह अलग विषय है। असम में एनआरसी कराकर समस्या समाप्त नहीं हुई बल्कि समस्या शुरु हुई है, पहले जो 19 लाख लोग खुद को भारतीय साबित नहीं कर पाए थे, अब वे अपने आपको यह साबित करेंगे वे भारतीय नहीं बल्कि बंग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से आए हैं। यानि अब वे अपने ऊपर ‘घुसपैठिया’ होने का ठप्पा लगवाऐंगे, और इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी इस दंश को भुगतेंगे कि वे ‘घुसपैठ’ करके भारत में आए थे।
इन लोगों की वही हालत होगी जैसी हालत पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान में बंगाल बिहार से आए मजदूर की होती है। फिर उनसे मनमाने ढ़ंग से काम कराया जाएगा, औने पौने दाम पर मजदूरी कराई जाएगी, एक तरह से यह क़ानून लोगों को गुलाम बनाने वाले पायदान की पहली सीढ़ी है।
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