भोपाल । विगत 15 वर्षो मेँ भाजपा नीत सरकार ने सूचना अधिकार अधिनियम 2005मेँ ताबड़तोड़ संशोधन कर उसको निष्क्रिय बना डाला है , बची खुची कसर करोड़ो के भवन मेँ वातानुकूलित कमरों और न्यायलयों मेँ बैठे मप्र सूचना आयोग के कर्ताधर्ताओं ने पूरी करदी । फलस्वरूप भ्रष्ट अधिकारी , कर्मचारियों मेँ सूचना अधिकार अधिनियम मेँ दी जाने वाली जानकारी देने से बचने की कोताही पर दंड का खौफ खत्म हो गया और वह जमकर मनमानी करने पर आमादा होगये । नतीजा यह निकला की सूचना अधिकार अधिनियम की आत्मा तक मर गई और अब सिर्फ और सिर्फ दिखावा रह गया है । अब अधिकारी , कर्मचारी आरटीआई कार्यकर्ताओ को धमकाने , चमकाने का काम कर रहें है । प्रदेश के 70-80प्रतिशत अधिकारी , कर्मचारियों को तो अधिनियम का ज्ञान तक नही , मगर अपने अल्प ज्ञान के बल पर वह आरटीआई कार्यकर्ताओ को धमकाते नज़र आते हैँ ।
ऐसा ही एक मामला छतरपुर के महाराजपुर के वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट कौंसिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव खेमराज चौरसिया के सामनें आया । उनके द्वारा पुलिस विभाग से लोकहित की , सार्वजनिक जानकारी पुलिस अधीक्षक कार्यालय छतरपुर में सूचना के अधिकार आवेदन दिनांक 11-3-2019 को प्रस्तुत कर मांगी । लेकिन चाही गई जानकारी निर्धारित समय पर नही मिलने पर उनके द्वारा अधिनियम के तहत प्रथम अपील 11 /6 /2019 को पुलिस अधीक्षक मेँ पेश की ।
श्री खेमराज चौरसिया द्वारा चाही गई जानकारी जनहित बल्कि राष्ट्र हित की होकर सार्वजनिक की जाने योग्य थी , जो इस प्रकार थी –
1-आवेदन दिनांक 11-09-2018 ,जिसमें दैनिक समाचार पत्र दैनिक भास्कर दिनांक 07-08-2018 प्रकाशित राष्ट्रीय ध्वज के प्रतीक अशोक चिह्न चक्र का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय ध्वज अपमान अधिनियम के तहत अपराध करने के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के संबंध में आवेदन का जांच प्रतिवेदन ।
2- आवेदन दिनांक 6/2/ 2019 का जांच प्रतिवेदन विषय टीवी न्यूज़ चैनल ind24 द्वारा राष्ट्रद्रोह की खबरों का व्यवसाय करने एवं उन्हे उन्हें प्रदर्शित न करने के संबंध में नियम बद्ध तरीके से इन सभी और इनकी संस्था पर कार्यवाही करने हेतु शिकायती- पत्र पर की गई कार्यवाही और अगर एफ आई आर दर्ज की गई तो उसकी कॉपी चाही गई थी
श्री खेमराज चौरसिया द्वारा चाही गई जानकारी जनहित की जानकारी थी जिसे सार्वजनिक किये जाने से किसी प्रकार का कोई अहित नही होना था , परंतु पुलिस विभाग द्वारा अपनी कारगुजारी को छिपाने के उददेश्य से सर्वप्रथम निर्धारित समय तक आवेदन का निराकरण नही किया और याद आने पर पूर्व तिथी मेँ प्रेषित कर लगभग 02 माह के विलम्ब के साथ श्री चौरसिया को एक पत्र भेजकर यह बताया कि आपके द्वारा मांगी गई जानकारी अधिनियम की धारा 8(जी) (एक)के अंतर्गत आने के कारण नही दी जा सकती है ।
गौरतलब हो कि अधिनियम की धारा 8मेँ उन जानकारियों को सार्वजनिक करने से रोका गया है जिनके प्रकटन से देश को नुक़सान हो, सुरक्षा और गोपनीयता भंग होने का अंदेशा हो। अर्थात ऐसी जानकारी को देने से रोका गया हो जो देश की सुरक्षा , अस्मिता , गोपनीयता का अतिक्रमण करती हो । जबकि श्री चौरसिया द्वारा चाही गई जानकारी का इससे कोई सरोकार नही । और वह जानकारी तो देश हित मेँ सार्वजनिक होना नितांत आवश्यक था । मगर पुलिस विभाग ने अपनी अनियमितताओं को छिपाने के लिए यह कहकर दामन बचा लिया कि चाही गई जानकारी धारा 8जी के तहत नही दी जा सकती है । यह बात इस बात का प्रमाण है कि पुलिस को विधि का ज्ञान नही है ।
बहरहाल सम्पूर्ण प्रदेश मेँ सूचना अधिकार अधिनियम अपनी मरणासन्न अवस्था मेँ है और यह कहने मेँ अतिशयोक्ति नही होगी कि वर्तमान समय मेँ यह क़ानून अब अनुपयोगी प्रतीत होता है । कमलनाथ सरकार यदि इस क़ानून की अस्मिता को जिंदा रखना चाहती है तो भाजपा सरकार द्वारा 15साल मेँ इस क़ानून मेँ किये संशोधनों को तत्काल समाप्त करे या घोषणा कर दे कि मप्र मेँ सूचना अधिकार अधिनियम समाप्त माना जाए ।
@सय्यद ख़ालिद कैस
