भोपाल । सूचना का अधिकार अधिनियम की जिस प्रकार विगत के वर्षो में शासन प्रशासन स्तर पर धज्जियां उड़ाई गई उसकी इन्तेहा नही । शिवराज सिंह चौहान सरकार ने जैसे अपने अधिकारी कर्मचारियों को यह हिदायत दी थी कि जिस स्तर तक हो सके जानकारियां छिपा सको , छिपाओ । सूचना कार्यकर्ताओ को इस अंतराल में जमकर प्रताड़ित किया गया।
आरटीआई एक्टिविस्ट कौंसिल ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महामंत्री खेमराज चौरसिया द्वारा विगत वर्ष राष्ट्रद्रोह के मामलों में ind24न्यूज़ चैनल और दैनिक भास्कर न्यूज़ पेपर पर एफ आई आर दर्ज
कराने के संबंध में आवेदन दिया गया । आवेदन के साथ साक्ष्य स्वरूप कुछ दस्तावेज़ भी पुलिस को सौंपे। परन्तु यह पुलिस की निष्क्रियता है या पक्षपातपूर्ण व्यवहार जो आवेदन को गंभीरता से नही लिया गया । पुलिस द्वारा उक्त आवेदन पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाना जहां अधिकारियों की योग्यता पर सवाल उठा रहा है वही सूचना के अधिकार के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैँ ।
आश्चर्य कि बात यह है कि उक्त प्रकरण में अपीलीय अधिकारियों को यह भी नहीं पता की अपील होने उपरांत मामले की सुनवाई के लिए समय सीमा भी सुनिश्चित की गई है।
गौरतलब हो कि पुलिस अधीक्षक छतरपुर का पत्र ने पूर्व में आवेदक और उनके कार्यालय के 22 किलोमीटर का फासला 60 दिन में पूरा किया था पर उक्त पत्र बंद लिफाफा था और आज फिर एक पत्र आवेदक को प्राप्त हुआ। उसमें कुछ जानकारी भेजी जाना प्रतीत भी हुई जो अस्पष्ट है और पत्र भी खुले लिफाफा में ही था। खुला लिफाफा पुलिस प्रशासन की नाकामियों को उजागर करता है । एक बात मेरी समझ के परे है कि जब उक्त लिफाफे पर आवेदक खेमराज चौरसिया का नाम लिखा हुआ था तो पत्र खुला कैसे………?
आवेदक को प्राप्त लिफाफा खुले होने पर संदेह के बादल छाए हुऐ हैँ जो यह साबित करता है कि कुछ तो पर्देदारी है जो पुलिस द्वारा छिपाई गई है ।
