@skhalidqais786
भोपाल । शिवराज सरकार के जाने के बाद प्रदेशवासियों को यह उम्मीद जागी थी कि अब कानून का राज होगा और लोगों को न्याय और सुरक्षा मिलेगी । परंतु शिवराज सरकार के समय से मंत्रालय में जमे नौकरशाह नही चाहते की जनता को न्याय नसीब हो । और उनको मिली कमलनाथ सरकार की छूट का नतीजा है कि कमलनाथ की चक्की में गेंहू कम घुन ज्यादा पिस रहा है ।
गौरतलब हो कि कानून व्यवस्था के नाम पर पिछले एक साल में पुलिस एवं प्रशासन के कुचक्र में राजधानी भोपाल के सैकड़ो लोगों को ज़िला बदर जैसी कठोर कारवाई का सामना करना जो निरन्तर अनवरत है । संपूर्ण मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल एक मात्र ऐसा ज़िला है जिसमें जनवरी 2019से जनवरी 2020 तक लगभग 300 से अधिक लोग कलेक्टर कोर्ट से ज़िला बदर हुए और कमिश्नर कोर्ट ने उनमे से 99.09%ज़िला बदर अपीलों को ग्राह्ता योग्य नही मानकर खारिज कर दिया ।
ज़िला बदर कानून की अवधरणा अपना रोककर लोकशान्ति को कायम रखना था , शायद इसी उद्देश्य से 1990में मध्यप्रदेश राज्य सुरक्षा अधिनियम अस्तित्व में आया । 2003तक यह कानून ठीक ठाक चला , परंतु राज्य सरकार ने 2003में एक अधिसूचना के माध्यम से ज़िला बदर करने की शक्ति भोपाल सहित कुछ जिलों में एडीएम को सौंप दी , यही से शुरू हुआ इस कानून का दुरुपयोग कर मानव अधिकारों का हनन !
2005में राज्य सरकार ने फिर एक अधिसूचना के माध्यम से ज़िला बदर का अपीलीय अधिकारी बदल डाला । 2005तक गृह विभाग में सुनी जाने वाला अपीलों का अधिकार संभागीय आयुक्त को सौंप दिया । नतीजा कलेक्टर एवं एडीएम के ख़िलाफ़ अपीलों में कमिश्नर द्वारा न्याय दान के स्थान पर अन्याय या लीपा पोती उजागर होने लगी ।
राज्य सरकार की 2003की अधिसूचना को 2010 में हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया , परंतु सरकार ने फिर भी अमल नही किया । 2013में अरविंद शर्मा विरुध मध्यप्रदेश राज्य में पुनः हाई कोर्ट जबलपुर ने राज्य सरकार की 2003की अधिसूचना को अवैधानिक कहते हुए रुपए 5000/-का अर्थदंड भी थोपा । परंतु सरकार ने फिर भी हाई कोर्ट की नही मानी । फलस्वरुप अवमानना याचिका के बाद 2018में सरकार ने एक लाईन की अधिसूचना जारी कर 2003की अधिसूचना को खारिज कर दिया । तबसे संपूर्ण मध्यप्रदेश में कलेक्टर ही ज़िला बदर प्रकरणों की सुनवाई कर रहे हैं ।
2018-2019का साल चुनावों से भरा था जिसका भोपाल पुलिस ने कानून व्यवस्था के नाम पर भरपूर लाभ उठाया । भोपाल के सभी थानो से प्रस्तुत पुलिस अधीक्षक प्रतिवेदनों पर कलेक्टर भोपाल ने जहाँ 88%लोगों को ज़िला बदर 10%को थाना हाजरी तो 2%को मुक्त किया । परंतु ज़िला बदर किए गये मामलों में कमिश्नर भोपाल ने 99%अपीलों को खारिज किया ।
भोपाल में ज़िला बदर होने वालों में 90%गरीब , मजदूर और जमानती अपराध वाले , जुआरी थे , शेष 8%रसूखदार और 2%ऐसे लोग भी ज़िला बदर हुए जो या तौ पूर्व से जैल में थे या जो कोर्ट में आए ही नही ।
अब सवाल यह उठता है ज़िला बदर कानून का अर्थ कानून व्यवस्था बनायें रखना और लोक शांति कायम रखना है । परंतु मौजूदा हालत देखी जाए तो पुलिस द्वारा प्रस्तुत ज़िला बदर मामले अपने उद्देश्य से काफ़ी दूर हैं । क्योंकि एक ही व्यक्ति को साल में 2-3बार ज़िला बदर करना कहां तक वाजिब है । कलेक्टर किसी व्यक्त को 3-6माह के लिये ज़िला बदर या थाना हाजरी करता है , वह मियाद पूरी होते ही पुलिस 25शस्त्र अधिनियम या जुआ एक्ट या मामूली लड़ाई झगड़ा का मामला बनाकर फिर कलेक्टर कोर्ट में मामला प्रस्तुत करती है और जहाँ से फिर उसे ज़िला बदर किया जाता है । यह सारे तथ्य बाकायदा रिकॉर्ड शुदा हैं । तो क्या ? यह न्याय है ! बिल्कुल भी नही ।
