भोपाल | गत दिनो इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से आमला क्षेत्र में ढाबे में काम करने वाले नौकर को ढाबा संचालक द्वारा एक खंबे से तारो से बांध कर उसके कपड़े उतार कर महज इसलिए मारा पीटा गया क्योंकि नौकर ने एक रोटी ज्यादा खा ली |
समाज किस दिशा में जा रहा है ये सोच कर घृणा होती है ऎसे मानव को जो एक मामूली से कार्य के लिए किसी के साथ इतनी अमानवीयता कर सकते हैं | ढाबा संचालक द्वारा अपने नौकर के साथ महज इसलिए लोहे की रॉड ओर लाठियों से तब तक मारपीट की गई जब तक वो लहूलुहान होकर बेहोश नहीं हो गया |
क्योकि उसने बिना पूछे एक रोटी ज्यादा खा ली थी |
क्या….? नौकर द्वारा ढाबा संचालक से बिना पूछे एक रोटी ज्यादा खाना अपराध था या उसका अपराध उसकी गरीबी थी, वह गरीबी जिसके कारण गरीब नौकर महज इसलिए ढाबा संचालक की अमानवीयता का शिकार होता है क्यू की उस ने एक रोटी ज्यादा खा ली.।
क्या….?
ढाबा संचालक का कृत्य अमानवीयता की हदें पार नहीं कर गया कि एक नौकर को उसके कपड़े उतार कर खंबे के सहारे तार से बांध कर लोहे की राड ओर डंडों से इसलिए पीटा जाता है कि वो नौकर है गरीब है तथा उसने एक रोटी ज्यादा खा ली |
अपराधी कौन है…?
नौकर जिसने अपने पेट की आग बुझाने के लिए ढाबा संचालक से पूछे बिना एक रोटी ज्यादा खा ली,, ढाबा संचालक जिसने एक ज़रा से कारण के लिए नौकर के साथ अमानवीयता की, या समाज जिसमे आज भी ऎसे लोग जीवित हैं जो अपने धन ओर बल के अहंकार मे गरीब और गरीबी दोनो को कुचलना अपना शोक समझते हैं,,, इस सब के लिए जिम्मेदार वो सिस्टम भी है जिसमे आप ओर हम साँस लेते हैं,,, परंतु इंसान होकर इंसान को इंसान की नज़र से ना देख कर आज भी दासता प्रथा को कही ना कही जिंदा रखे हुए हैं,, धिक्कार है ऎसे समाज का जो आजादी के इतने सालों बाद भी ऊंच नीच अमीर गरीब के भेद भाव को जड़ से खत्म नहीं कर पाया है
कभी कभी ऎसा एहसास होता है कि हम आज भी अंग्रेजों के गुलाम है
फर्क बस इतना है कि आजादी के पहले हम गोरे अंग्रेजों के गुलाम थे ओर आजादी के बाद हम काले अंग्रेजों के गुलाम है
अमीरों की मानसिकता आज भी उतनी ही संकीर्ण है जितनी 1947 के पूर्व थी इस मामले में ढाबा संचालक कानून का तो मुजरिम है ही इंसानियत का दुश्मन भी है,, जिसका दंड उसका सामाजिक बहिष्कार है |
किसी को ये अधिकार नहीं की किसी को बिना अपराध के दंडित करे |
ये घटना इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक ऎसी घटना है जो समाज में पल रहे उस नासूर की भांति है जिसका इलाज संभावना होने पर शरीर के उस अमुक अंग को काट कर कर इंसानियत को बचाने के प्रति एक महत्वपूर्ण कदम होगा |
सय्यद खालिद कैस
समूह संपादक
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