आजादी की जंगे आजादी में शामिल भारत माता के सच्चे सपूतों और महापुरुषों की मूर्ति स्थापित करने की परम्परा रही है।आजादी के बाद जगह जगह तमाम आजादी के मतवालों और हमारे महापुरुषों की प्रतिमाओं की स्थापना की गई है जिनका सभी लोग सम्मान करते हैं। मूर्तियों के सहारे राजनीति करने की परम्परा कभी नही रही है लेकिन बदलते राजनैतिक दौर कुछ दलों ने मूर्ति आधारित राजनीति शुरू कर दी है।बसपा कार्यकाल में जितनी मूर्तियां स्थापित की गई उतनी शायद आजादी के बाद से नही की गयी होगी।त्रिपुरा में दो दिन पहले तोड़ी गयी कम्युनिस्ट नेता लेनिन की मूर्ति को लेकर वामदलों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और इसकी प्रतिक्रिया में मूर्तियों के तोड़ने का दौर शुरू हो गया है। त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ने का जबाब वामदलों के समर्थकों द्वारा कलकत्ता में लगी जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मूर्ति के मुंह पर कालिख पोत कर और क्षतिग्रस्त करके दिया गया है। इतना ही नहीं इसी बीच तमिलनाडु के वेल्लूर में द्रविड़ आंदोलन के संस्थापक दलितों के मसीहा पेरियार की मूर्ति को तोड़ दिया गया है।इस घटना के विरोध में द्रमुक और अन्य दल वहां पर प्रदर्शन भी कर चुके हैं।त्रिपुरा से शुरू हुआ मूर्ति तोड़ने का क्रम मेरठ तक पहुंच गया है और वहाँ पर खुर्द गाँव में लगी अम्बेडकर बाबा की मूर्ति को कुछ लोगों ने क्षतिग्रस्त कर दिया है।त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति टूटने के बाद फैली हिंसा नियंत्रित होती नजर आ रही है। वामपंथी विचारधारा के प्रतीक और रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा को जिस तरह बुलडोजर से तोड़ा गया उसे लोकतांत्रिक देश में उचित मर्यादा पूर्ण आचरण नहीं कहा जायेगा। यह सही है कि कुछ लोग वामदलों के पच्चीस साल के शासन से उकता और गुस्सा गये थे।लेनिन की मूर्ति टूटना उसी आक्रोश और गुस्से का प्रतिफल है। लेनिन हमारे महापुरुष या आजादी के मतवाले सैनिक नही हैं वह वामदलों के राजनैतिक आस्था के प्रतीक हो सकते हैं। भारत देश में उनकी प्रतिमा स्थापित करने का कोई औचित्य भी नही है क्योंकि वह भारतमाता के धराधाम से जुड़े हुए नहीं हैं। इसके बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह तोड़फोड़ मनमानी करने का अधिकार किसी को भी नहीं है इसलिए जिसने भी मूर्तियों को तोड़कर वैमनस्यता पैदा कर हिंसा फैलाने की कोशिश की है उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए।श्यामाप्रसाद मुखर्जी हो चाहे अम्बेडकर बाबा हो इन दोनों का योगदान भारतमाता के प्रति उल्लेखनीय और सराहनीय रहा है इसका इतिहास इसका गवाह है। श्यामाप्रसाद मुखर्जी की तुलना लेनिन से नहीं की जा सकती है और ऐसा करना उनका अपमान होगा। मूर्ति तोड़ने का बदला मूर्ति तोड़कर देने का मतलब जैसे को तैसा जबाब ही माना जायेगा जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है।मूर्तियों को तोड़ने का काम समाज नहीं बल्कि समाज के कुछ राजनैतिक सौदागर करते हैं और पूरे समाज को साम्प्रदायिकता की आग झोंककर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं।मूर्ति किसी की भी लगी हो उसे तोड़ना क्षतिग्रस्त करना अपमानित करना कतई राष्ट्रहित में नहीं माना जायेगा।हालांकि देश के प्रधानमंत्री व गृहमंत्री ने मूर्तियों के तोड़ने क्षतिग्रस्त कर अपमानित करने की घटनाओं को गंभीरता से लिया है और गृह मंत्रालय की ओर से एडवाइजरी जारी करके इन घटनाओं की जिम्मेदारी सीधे डीएम एसपी को सौंपने के निर्देश दिये हैं।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी इन घटनाओं को नितांत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इनका विरोध करते हुए कहा कि अगर कोई उनकी पार्टी का कोई सदस्य मूर्तियों को तोड़ने में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जायेगी।दूसरी तरफ कलकत्ता में श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को अपमानित करने और क्षतिग्रस्त करने के आरोप में आधा दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है।त्रिपुरा चुनाव के बाद तोड़फोड़ मारपीट के दौर पर प्रधानमंत्री गृहमंत्री का तात्कालिक स्तक्षेप सराहनीय कदम है।
