सूचना के अधिकार की कब्रगाह अगर मध्य प्रदेश के छतरपुर को कहा जाए तो गलत नहीं होगा आवेदन पर जानकारी देना तो अलग बात है। अपील सुनवाई की समय सीमा तक निर्धारित नहीं।
जिले के कार्यालय में बैठे अधिकारियों की बात एक कार्यालय की होती तो अलग होती परंतु शिक्षा विभाग की बात करें। तो इंवरर्सिटी हो या महाविद्यालय से लेकर संकुल तक अपील होने के बाद सुनवाई के लिए समय नही सिर्फ पत्राचार कर एक पत्र भेज दिया जाता है और अपने आप को बचाते है अधिकारी निराकरण करने की समय सीमा सुनिश्चित नहीं।
जिला पंचायत हो या जनपद पंचायत,पंचायत हो जिले में बैठे अधिकारियों को सूचना के अधिकार की सुनवाई के लिए तारीख देने का भी समय नहीं बरसों से पेंडिंग पड़े मामले।
नगर पंचायत,नगरपालिका के हाल भी ऐसे ही है।उनके यहां तो रजिस्ट्री डॉक से भेजे आवेदन भी खो जाते है। और प्रशासनिक अधिकारी से बार-बार शिकायत करने के बाद पावती तक नहीं दी जाती।
लोक निर्माण विभाग की बात करें तो यहां तो सब करोड़ों का यहां से जानकारी मिलना संभव ही नहीं।
खनिज विभाग की आवेदन की अगर बात करें तो आवेदन पर तारीख तो देते हैं पर जानकारी नहीं अपील कलेक्टर साहब के यही करोगे ना साहब आदेश भी दे देंगे तो प्रमाणिक जानकारी मिलना संभव नहीं।
कलेक्ट्रेट कार्यालय की बात करें तो उनके आदेशों को मानने के लिए कोई तैयारी नहीं है उनके यहां भी सुनवाई की समय सीमा सुनिश्चित नहीं सभी विभागों पर नजर रखने वाला कलेक्टर कार्यालय मैं भी अपील होने के बाद सिर्फ पत्राचार।
नगर पालिका और नगर पंचायत है तो साहब के आदेश मानते ही नहीं।
अनुविभागीय अधिकारी एवं तहसील कार्यालयों में बात अगर करें तो सूचना के अधिकार में नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिख जाना चाहिए। महाराजपुर तहसील के गढ़ी मलहरा सर्किल तहसीलदार खुलेआम अतिक्रमण पर झूठा प्रतिवेदन पटवारी के हवाले से हरे भरे पेड़ कटाई का मामला हो या हल्का में अतिक्रमण तहसील से 100 फीट पर हो रहा अतिक्रमण पर नजर नहीं पड़ती तहसीलदार महोदय को आखिर सरकारी जमीन किसकी यह सवाल बना हुआ है।
सूचना का अधिकार कमाई का जरिया बन चुका है पर इसमें दोषी कौन आवेदन करता या कार्यालय में बैठने वाला अधिकारी जिसे सुनवाई करने का भी समय नहीं बस एक अब यही सवाल बाकी बचा हुआ है जिसका अब जवाब शायद कोई दे।
एमपी छतरपुर@:-खेमराज चौरसिया(आरटीआई कार्यकर्ता)
