वरिष्ठ पत्रकार मनोज दुबे की कलम से
आखिर कब तक रहेगा पचमढ़ी सतपुडा की रानी का यह दैवीय प्राकृतिक सौंदर्य क्षीर्ण होते जा रहे सघन वन और विनाश की तरफ बढते जा रहा पचमढ़ी का विकास । क्या किसी दिन यह पर्वत श्रृखँलाये नँगी हो जायेगी ,जब वृक्ष ही नहीं होगें ,तो पक्षी कहा होगें, पानी कैसे रुकेगा, और बहेगा , पचमढ़ी के पर्यावरण से नित रोज खिलवाड़ कर विकास द्रुतगति से चहुँ और हो रहा है , चारो तरफ विकास की होड लगी है, सीमेन्ट और क्राँक्रीट से नव निर्मित विकास चरम सीमा पर पहुंच रहा है ।आखिर क्या होगा इसका परिणाम , कभी आपने सोचा और विचारा है , धरती पानी केसे पियेंगी क्या पचमढ़ी के बुद्धि जीवियों ने यह नियति स्वीकार कर ली जो पचमढ़ी की चिन्तन सतत् ,धारा से जुडे थे वे स्वर्गलोक सिधार गयें वे थे पचमढ़ी की.माटी मे जन्मे …. स्वँर्गीय स्वतंत्रता सँग्राम सेनानी दुर्गा प्रसाद जायसवाल , वे थे स्वँ. बँशीधर चौरसिया , वे थे .. स्वँ. प्रेमनारायण जायसवाल ,और हाँ वे …थे… गया प्रसाद साहू …. आदि अनेक रत्न ।
राजनेताओं मे स्वँर्गीय श्यामाचरण जी शुक्ल मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश , देश रत्न डाँ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति , सरला ग्रेवाल राज्यपाल मध्यप्रदेश , पत्रकारिता के पितामह नवभारत पत्र समूह के सँरक्षक स्वँ. रामगोपाल जी माहेश्वरी , और जिन्होंने पचमढ़ी के कुरुप होते जा रहे सौन्दर्य को बचाने खूब.अपने मुखपत्र के द्रारा सरकार को चेताया महेश श्रीवास्तव की कलम और सतत् निरंतर कही समाचार पत्रो के माध्यम से तो कही पत्रोँ के माध्यम से पचमढ़ी को सतत् निरन्तर बचाने का सार्थक प्रयास करते रहे, साहित्यकार महेंद्र दुबे , और इसके बाद भी क्रम रुका नही लिखने का और लिखते चले गये समाज सेवी और प्रखर नेता मोतीलाल जैन , इन्होंने हमेशा पचमढ़ी की चिंता की और कुरुप होते जा रहे पचमढ़ी के विकास पर आज भी चिन्ता है एक वे थे और आज धरोहर के रुप मे पचमढ़ी का भविष्य तय और स्वीकार कर लेने वाली पचमढ़ी की.युवा पीढी सामने कतार मे खडी दृश्य देख रही और सब मौन है।

आखिर कहा ले जा रहे है पचमढ़ी का इस तरह विकास कर इसे रसातल मे आधुनिक पर्यटन की आपाधापी और चकाचौंध मे आँखो पर पट्टी बाँधकर , क्या यह नियति हम सबने.स्वीकार कर ली तो आने वाली हमारी.ही पीढियां जब पूछेगी की कहाँ गये वे कल कल बहते झरने और रजत धाराये, कहाँ गई महादेव गुफा मे टपकती जल की नैसर्गिक पानी की बूँदे, और कहाँ है बाणगंगा नदी का वह उद्गगम श्रोत , और कहाँ गई वह.पुरातात्विक धरोहरें , भीत्ति चित्र , कहाँ गई वे पचँधारा की लकडी जिसे पकडकर हमारे पूर्वज हाथ मे लेकर चला करते थे।
आम, महुआ , गुली , जामुन ,अचार , शहद , और अनगिनत वनौषधियाँ , कहा गई तो क्या हमे यह कहना पडेगा की अब कहा फिर कोई इसका पुरातात्विक सर्वेक्षण करायेगा की पचमढ़ी वही है।पर रँगत बदल गई और सब कुछ आधुनिक सँस्कृति की चकाचौंध मे कपूर की भाँति स्वाहा हो गई ,
फिर कौन आयेगा पचमढ़ी घूमने और कौन कहेगा की पचमढ़ी घूमने चले आज से कुछ वर्ष पूर्व ही स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से बाहर से लोग आकर पचमढ़ी के महीनों रुका करते थे और स्वास्थ्य लाभ लिया करते थे , वन औषधियों की महक से ही कँई रोग ठीक हो जाया करते थे पर अब वह.सुगंध थोडी और शेष बची है वह भी कही कोई दिशा तय कर कर लेगी तब हम कही इसी सघर्ष. समीति के बैनर तले यह आवाज़ तो नही लगायेगे लौटा दो हमे हमारी पुरानी पचमढ़ी और इसकी प्राकृतिक , नैसर्गिक धारा.को धरना और.प्रदर्शन तो नहीं करना पडेगा की कोई लौटा दो मेरे बीते हुये दिन वही अच्छे थे।
जब पानी ही नहीं रुकेगा और बहेगा तब यह पहाड़ और मिट्टी के ढेर और ढर्रे भूतों के ढेरे नजर नहीं आयेगे ,अर्थ धन कमाना.भी लक्ष्य होना चाहिए पर अन्य साध्य और साधनों की उपेक्षा भी नहीं होनी चाहिए ।
मध्य क्षेत्र का.सर्वोत्कृष्ट राजतिलक सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी की हो रही दुदर्शा को बचाने क्या मध्य क्षेत्र के किसी मसीहे को जन्म लेना पडेगा।
पचमढी का यह दैवीय प्राकृतिक सौन्दर्य ,क्या सौन्दर्य कहला सकेगा और क्या इस विकास.से दाग नही लगेगा ,इसी गर्मियों मे जब मध्यप्रदेश सहित सरकार और राजनेतिक दलों के राजनेता यहां आते थे तो पूरी केबिनेट मँत्रीपरिषद आती थी अब कुछ गिने चुने नेता आते है और अपनी पहँदीदा. होटलो मे ए. सी. और डीलक्स कमरो मे रात बिताते और इसी के साथ कुछ आला अधिकारी भी यहां आते और घूमकर मूछों पर ताँव देकर चले जाते।
पचमढ़ी तब भी वहीं थी आज भी वहीं ,परन्तु पर्यटन की आपाधापी और पर्यटन सँस्कृति के विकास से जो लाखो करोड़ों की योजनाएं चहूँ और दिख रही.है। उससे न केवल पचमढ़ी के पर्यावरण पर इसका असर हो रहा है बल्कि तापमान भी तेजी से निरंतर बढ रहा है।
सरकार को इस दिशा मे पहल कर पचमढ़ी की फिजा से खिलवाड़ न.हो सार्थक पहल नही की गई तो दुष्परिणाम . भुगतने होगें। तय करने वाले.समाज के प्रथम पँक्ति मे गिने जिते है और.स्वीकार करने वाले आम लोग.है ।
